Saturday, 18 May 2013

कल -कल ,करता नदी का जल
जाने कहाँ -कहाँ जाता है निकल
बिना थके ,बहता रहता है अविरल
अनवरतता का देता हुआ सन्देश सरल

आओ एक नदी बन जाए
सबको समेटे ,सबको बहाए
 
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नसीब


नसीब भला या खोटा नहीं होता
कोई बड़ा या छोटा नहीं होता

नसीब जैसे कोई खाली बर्तन
जिसको भरने हमें करना है जतन

बैठ मत खाली, नसीब को न रो
मेहनत करके ,इसको भरो

जो लोग लगे रहे ,वे नाम बन गए
जो रोते रहे ,वे आम रह गए

मांगे बिना ,भीख नहीं मिलती
पड़े बिना, सीख नहीं मिलती
 
दांव
मैं चाहता हूँ, उलझनों से घिरना
चाहता हूँ, अपने धैर्य को परखना
हो जाए चाहे कितना ही अँधेरा,
उजाले की तलाश ,है लक्ष्य मेरा

अनंत नहीं होती कोई भी, दिवार
उसके भी , होता है बहुत आर -पार
उलझने ही पैदा करती है भाव,
उलझने ही लगवाती है दांव

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