Saturday, 18 May 2013

अंजान की शादी भी याद रहती है ,अपनों का जनाजा भूल जाते है गाँव की खुशबू से नफरत करने वाले शहरी,शहर में धूल खाते है

इतना मशरूफ कर लो खुद को कि,उदासी भूल जाए दिल.
अपने अक्स में जिसने ढूडी कमिया वही बना काबिल
 
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वे क्या जाने ,दस्ताने वतन
जो बढ़ाते है ,अपने बदन

उस माँ से पूछो ,वतन की कीमत ,जिसने किया अपना लाल
कुर्बान वतन को ,बिना किये कोई जबाबो-सवाल .
भूल गयी वह ,जो उसने किये थे जतन

वे क्या जाने ,दस्ताने वतन
जो बढ़ाते है ,अपने बदन

कोई बना वजीर,कोई बना अमीर
पर है नहीं ,इनका कोई जमीर
ये तो है ,खुद में मगन
वे क्या जाने ,दस्ताने वतन
जो बढ़ाते है ,अपने बदन

सच्चे सैनिक लोहा लेते है ,दुश्मन से सीना तान
मजहब से नहीं, कुर्बानी से होती है जिनकी पहचान.
शहादत से भरा,उनका तन मन
वे क्या जाने ,दस्ताने वतन
जो बढ़ाते है ,अपने बदन
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