कविता क्या होती है
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सच मानो ! मुझे पता नहीं,
कविता क्या होती है,
अक्सर भाव उठते है ,
जब दुनिया सोती है .
पन्ने फड़फड़ाते है,कलम चलने लगती है.
शब्द चमचमाने लगे है,
लगता है मोती है .
सच मानो ! मुझे पता नहीं,
कविता क्या होती है,
गरीब के आंसू ,किसी अबला की छटपटाहट.
रोटी जुटाने में लगे मजदूर की थकावट .
मुझे छू लेती है भीतर तक कहीं,
तब-तब आत्मा रोती है.
सच मानो ! मुझे पता नहीं,
कविता क्या होती है,
भोगो से नित ,बिगड़ता पर्यावरण
जीव जंतुओं का निकट है मरण
व्यतिथ ह्रदय विषाद से भरा
जाने धरती हमे धोती है
सच मानो ! मुझे पता नहीं,
कविता क्या होती है,
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