Saturday, 18 May 2013

सोना और लोहा

सोना भी,और लोहा भी होता है ,रेत के ढेर में!
कुछ लोग उम्र गुजार देते ,उसे ढूढने के फेर में!

सोना मिल जाए तो उसका करना होता है उसका जतन
सोने की हिफाजत के लिए ,बनाना पड़ता है एक भवन

भवन बनाने के लिये ,सोना नहीं आता है काम
रेत और सीमेंट मिल कर देते है बिल्डिंगों को अंजाम
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पड़ेगा अगर भोग विलास
तो होगा चरित्र का नाश
बंद हो जायेगा आहार ,व्यवहार
बढता चला जाएगा भ्रस्टाचार
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उनका नहीं था कोई कसूर ,
वह थे दिल के आगे मजबूर
अहं ने दिल में आग ऐसी लगाईं,
जल गयी मोहब्बत की रजाई
 
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गर्मी आते ही सूरज का बहिष्कार
लेकिन शरद ऋतु में सूरज का इन्तजार
सूरज वही ,धरती वही !
बात तो है यही!

आओ बात समझे ,जाने
क्या है इस सबका माने!
उग्र स्वभाव जैसे गर्मी का सूरज
अच्छा स्वभाव वैसे सर्दी का सूरज!
सर्दी का सूरज बन जाओ
सबके दिल में छा जाओ!
 
 
 

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