Saturday, 18 May 2013

क्षणिका

कांटे न होते तो मै खोया रहता!
आंधीयाँ न आयी होती तो सोया रहता.
गढ्डे न आये होते ,मै सचेत न होता!
अगर टूट जाता तो मै रेत न होता.
नहीं चाहिए फूलो का हार,
मुझे तो है काँटों से प्यार
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वो फूल ,फूल क्या ,जिसमे शूल न हो!
वो याद ,याद क्या ,जिसमे भूल न हो!
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मिटटी,खाद, पानी हो तो , पत्थर में भी बाग़ लगाया जा सकता है,
मेहनत, हौसला, धैर्य हो तो रूठे भाग को भी मनाया जा सकता है !
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