Thursday, 23 May 2013


वह किसी से मिलता नहीं, जुदाई के दर से,
नहीं तो उसका क्या वास्ता,तन्हाई के घर से.

वह बिखरा है अनेको बार ,टूट के इतना.
दोस्ती तोड़ दी सबसे इसी डर से.

कभी किसी के दिल का नूर था,वह,
आज बचता –फिरता है ,उसी के नजर से

जख्म दे गए गहरा ,कुछ चेहरे इतना,
की उभर आते है ,वो दीवारों-पत्थर से.



Saturday, 18 May 2013

चिराग आएगा ही याद, जब- जब भी अँधेरा होगा, हारा वो गुमनाम,जीते हुए से सब कहेंगे ,ये कोई अपना मेरा होगा

चिराग आएगा ही याद, जब- जब भी अँधेरा होगा,
हारा वो गुमनाम,जीते हुए से सब कहेंगे ,ये कोई अपना मेरा होगा

अपेक्षाओ का बोझ ढोते बच्चे


अपेक्षाओ का बोझ ढोते बच्चे
किताबो के पुलंदे तले दबे बच्चे
तर्क-वितर्क में उलझे बच्चे
अविकसित दिमाग से जूझते बच्चे
अबोधवय में अर्जित ज्ञान
ये तो नहीं कुशाग्रता की पहचान
क्या ये बन तो नहीं रहे  रोबोट
स्वकेन्द्रित होते बच्चे.
संस्कारो से इनका वियोग तो नहीं,
क्या ये आधुनिकता नाम का रोग तो नहीं?


          

अहंकार


अहंकार

अहंकार एक सागर है ,
जहाँ, अहं की लहरे
लेती है अक्सर हिलोरे.

ये लहरे लील लेती है,
उन मछुवारो को ,
जो है प्रेम का प्रतीक

अक्सर उठते है इनसे
ज्वर भाटा के बवंडर.
कभी सुनामी सा कहर.

प्रेम,त्याग,स्नेह की
गंगा,जमुना,सरस्वती
खो देती है अपना अस्तित्व,
इस अहं सागर में ,
होते ही विलीन.

तब रह जाता है वहां केवल,
और केवल अहंकार का सागर

कोई दर्द बुरा नहीं होता . बिना दर्द के कोई नहीं रोता

कोई दर्द बुरा नहीं होता .
बिना दर्द के कोई नहीं रोता .

दर्द प्रक्रिया है जनन की,
दर्द कवायद है ,मनन की।
वो क्या तैरेंगे ,जो लगाइएँगे नहीं गोता
कोई दर्द बुरा नहीं होता .
बिना दर्द के कोई नहीं रोता .
कमलेश ,जो दर्द न होता तो तलाश न होती सुकून की
खून न  बहा हो जिसका ,वह कीमत क्या समझे खून की
दर्द देने वाला ,सुकून के बीज नहीं  बोता

दर्द ने बनाये अनगिन कवि ,शायर
जो बचा दर्द से ,वो बना कायर
बनो इंसान ,बनो नहीं तोता
कोई दर्द बुरा नहीं होता .
बिना दर्द के कोई नहीं रोता .
 

खुले हुए मन के नैन, देते दिल को सबसे चैन .



खुले हुए मन के नैन,
देते दिल को सबसे चैन .

देह के नैन तो होते है कातिल .
अच्छे -अच्छो को बना दें नाकाबिल .
कर देते ये सबको बैचैन .
खुले हुए मन के नैन,
देते दिल को सबसे चैन

देह के नैन देखे ,साज श्रृंगार ,
मन के नैन  ढूडे सब में प्यार
जागे रहते जो हर दिन रैन
खुले हुए मन के नैन,
देते दिल को सबसे चैन

देह तो है केवल विज्ञापन .
नैनो को दीखता है बस तन.
मन है अमृत तो देह शेम्पैन
खुले हुए मन के नैन,
देते दिल को सबसे चैन

अंजान की शादी भी याद रहती है ,अपनों का जनाजा भूल जाते है गाँव की खुशबू से नफरत करने वाले शहरी,शहर में धूल खाते है

इतना मशरूफ कर लो खुद को कि,उदासी भूल जाए दिल.
अपने अक्स में जिसने ढूडी कमिया वही बना काबिल
 
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वे क्या जाने ,दस्ताने वतन
जो बढ़ाते है ,अपने बदन

उस माँ से पूछो ,वतन की कीमत ,जिसने किया अपना लाल
कुर्बान वतन को ,बिना किये कोई जबाबो-सवाल .
भूल गयी वह ,जो उसने किये थे जतन

वे क्या जाने ,दस्ताने वतन
जो बढ़ाते है ,अपने बदन

कोई बना वजीर,कोई बना अमीर
पर है नहीं ,इनका कोई जमीर
ये तो है ,खुद में मगन
वे क्या जाने ,दस्ताने वतन
जो बढ़ाते है ,अपने बदन

सच्चे सैनिक लोहा लेते है ,दुश्मन से सीना तान
मजहब से नहीं, कुर्बानी से होती है जिनकी पहचान.
शहादत से भरा,उनका तन मन
वे क्या जाने ,दस्ताने वतन
जो बढ़ाते है ,अपने बदन
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मौत एक दिन आएगी ये तो तय है, तो जिन्दगी जीने में क्यों भय है.

मौत एक दिन आएगी ये तो तय है,
तो जिन्दगी जीने में क्यों भय है.

आओ संवारे ये जीवन के अनमोल पल
आज जिलो भरपूर, किसने देखा कल .
जियो और जीने दो ,यही इसका आशय है
मौत एक दिन आएगी ये तो तय है,
तो जिन्दगी जीने में क्यों भय है.

कपड़ें से सेहरा बने ,कपड़ें से कफन,
इनसे कोई न बचा ,लाख करो जतन.
मौत एक दिन आएगी ये तो तय है,
तो जिन्दगी जीने में क्यों भय है.

यही रह जायेंगे नफरत, दर्प ,अभिमान,
देर न करो ,बन जाओ बस इनसान.
जो दुनिया को कुछ दे गया , होती उसकी जय है
मौत एक दिन आएगी ये तो तय है,
तो जिन्दगी जीने में क्यों भय है.
अँधेरा हो इससे पहले जला लेना चिराग .
बीज की चिन्ता से पहले बना लेना बाग़

दिल के दरवाजे गर बंद हो तो,
क्या करेगा तालीम हासिल करके दिमाग

बदन के दाग मिटाए ,जा सकते है,
कौन मिटाएगा दिल के दाग.
 
 
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जो अँधेरी गली से न गुजरे हो ,वह क्या जाने उजाले को .
जो नही भागते पैसे के पीछे , वह क्या जाने ताले को
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कुदरत का करिश्मा

अद्भुत खेल कुदरत का,
जहाँ काम नहीं नफरत का.

किसी पेड़ में फूल,किसी में फल
किसी में आम ,किसी में कटहल
कहीं घास के मैदान,कहीं जंगल दरखत का.
अद्भुत खेल कुदरत का,
जहाँ काम नहीं नफरत का.

उसी ने बनाए सूक्ष्म प्राणी ,उसी ने विशालकाय,
समस्या पैदा करते ही ,बनाये उपाय
उसके लिए न प्रेमी अमेरिकी,न गैर भारत का
अद्भुत खेल कुदरत का,
जहाँ काम नहीं नफरत का.

कही शीत की लहर,
कही गर्मी का कहर
असंतुलन न हो कही,ध्यान रखा इस बात का
अद्भुत खेल कुदरत का,
जहाँ काम नहीं नफरत का.
 
 
मैं हार की उस पराकाष्टा तक गुजर जाना चाहता हू,
जहाँ से हार भी हार मान ले!

दर्द , तब दर्द नहीं रह जाता
जब उसे हम प्यार मान ले!

जहर ने डुबाया हमें आकंठ
फिर भी हुम न हुए नीलकंठ
 
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जहाँ चहकती थी ,गोरैया ,मैना
गाडियों का शोर है ,वहां दिन रैना

किसे भायेगा ऐसा शहर
जहाँ मुश्किल हो गुजर बसर
आएगा ऐसी जगह कहाँ से चैना
जहाँ चहकती थी ,गोरैया ,मैना
गाडियों का शोर है ,वहां दिन रैना

बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएं,बनाई भोग के लिए
अस्पतालों का अम्बार लगाया रोग के लिए
इससे बढ़िया लाख ,गाँव का चना चबेना
जहाँ चहकती थी ,गोरैया ,मैना
गाडियों का शोर है ,वहां दिन रैना

लूटपाट ,पाप ने मचाया कहरसं
वेदना शून्य हो गया शहर
यहाँ किसी को किसी से प्यार है ना
जहाँ चहकती थी ,गोरैया ,मैना
गाडियों का शोर है ,वहां दिन रैना
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भीड़ में जाता हू,जब भी, मन होता है अकेला.
खोने का डर सताता है,जब होता है मेला

पसंद नहीं मुझे ,बयार में बहना
अखरता है ,मुझे ज्यादा देर बाजार में रहना
मुझे गुरु न बनाओ,मैं अच्छा नादान चेला.
भीड़ में जाता हू,जब भी, मन होता है अकेला.
खोने का डर सताता है,जब होता है मेला

वाचालता बन जाती है कभी उल्टा तुरुप,
इससे तो लाख बढ़िया ,है रहना चुप.
चुप आदमी करता नहीं कहीं झमेला
भीड़ में जाता हू,जब भी, मन होता है अकेला.
खोने का डर सताता है,जब होता है मेला

ज्ञान का तमगा किसी की जागीर नहीं.
अति मीठी या न मीठी, ठीक खीर नहीं
बुराई दूर करो खुद से,रोज बनो नया नवेला
भीड़ में जाता हू,जब भी, मन होता है अकेला.
खोने का डर सताता है,जब होता है मेला
 
 

जिन्दगी दिखाई देती है ,जब कोई दुनिया में आता है,
लेकिन आँखे मूद लेते है, जब कोई दुनिया से जाता है.

गौर से ख्याल करना ,नाचती है मौत शमशान में,
लेकिन हम तो खोये रहते है ,अपनी आन -बान में.

कठपुतली बन जाते है मौत के हाथो,पैदा होते ही हम
डोरी खींचले कब पता नहीं , मौत को आता नहीं किसी पे रहम
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बड़ा

हम में से हर कोई ,बनना चाहता है बड़ा!
बड़ा होना क्या होता है ये शायद हमें नहीं पता.

कोई पद का पा लेना या अकूत धन पा लेना ?
विशाल काय शरीर पा लेना या सुंदर तन पा लेना?

क्या वह बड़ा है ,जिसका दिमाग चलता है हर वक़्त
या वह बड़ा है ,जिसके है हजारो हजार भक्त,

यह बड़ा कहाँ होता है ,है किसी को पता
ये कैसे हासिल होता है,है किसी को पता

लोग कहते है,भगवान् है बड़ा
तो इस बड़े के लिए , इनसान क्यूँ लड़ा
 
कल -कल ,करता नदी का जल
जाने कहाँ -कहाँ जाता है निकल
बिना थके ,बहता रहता है अविरल
अनवरतता का देता हुआ सन्देश सरल

आओ एक नदी बन जाए
सबको समेटे ,सबको बहाए
 
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नसीब


नसीब भला या खोटा नहीं होता
कोई बड़ा या छोटा नहीं होता

नसीब जैसे कोई खाली बर्तन
जिसको भरने हमें करना है जतन

बैठ मत खाली, नसीब को न रो
मेहनत करके ,इसको भरो

जो लोग लगे रहे ,वे नाम बन गए
जो रोते रहे ,वे आम रह गए

मांगे बिना ,भीख नहीं मिलती
पड़े बिना, सीख नहीं मिलती
 
दांव
मैं चाहता हूँ, उलझनों से घिरना
चाहता हूँ, अपने धैर्य को परखना
हो जाए चाहे कितना ही अँधेरा,
उजाले की तलाश ,है लक्ष्य मेरा

अनंत नहीं होती कोई भी, दिवार
उसके भी , होता है बहुत आर -पार
उलझने ही पैदा करती है भाव,
उलझने ही लगवाती है दांव


हमारे चेहरे पे न जाओ, हमारे भाव पे न जाओ
हम दर्द में भी मुसकराते है, हमारे घाव पे न जाओ

आग के लिए रेत बन जाओ
पानी के लिए खेत बन जाओ

दूसरे के अहसान याद रखना,अपने भूल जाना
डूबता नहीं, वह, जिसने ये फलसफा माकूल माना


जिंदगी सिखाती है हमें हर पल
नफरत ,प्यार बनाये उसे अकल
नेकी करो ,बिना किसी चाह के
तभी कांटे दूर होंगे राह के
दुःख हो या हर्ष
मत छोडो संघर्ष

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आओ ,निकल चले वहाँ ,
प्यार बिकाऊ न हो जहाँ,

प्यार हर दिल में है
काबिज वह तिल - तिल में है
पास देखो, दूर खोजते हो कहाँ

आओ ,निकल चले वहाँ ,
प्यार बिकाऊ न हो जहाँ

दिल टूट जायेगा,ज्यादा अकड़ कर
चले ,भावनाओ की डोर पकड़ कर
जीना यहाँ , मरना यहाँ

आओ ,निकल चले वहाँ ,
प्यार बिकाऊ न हो जहाँ
गर दीवारों में ईट हो नफरत की,
सोचना भी नहीं बात छत की.
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“सोचो भला और करो भला”
खुद को खुदा मानने का मत पालो गरूर,
हर इंसा में अच्छाई के साथ बुराई भी होती है जरुर.
गुलाब का फूल सब को भाता
पर उसका भी है ,काँटों से नाता
अच्छाई, बुराई तो है केवल विचार
वह तो बाहर निकलने रहते है तैयार
इनको काबू में करने की है एक कला,
“सोचो भला और करो भला”
 
 
दिल और दिमाग.
दिल और दिमाग.
जैसे दरिया और आग!
कोमल ,सुंदर मासूम होता है दिल
वह नहीं बनाता किसी को कातिल!
दिमाग जैसे दुधारी तलवार!
हजार को शून्य, शून्य को कर दे हजार
हार न नहीं चाहते अगर , जीवन के खेल!
कर लो दिमाग का दिल से मेल !
 
इनसान

सोचो जरा ,कौन है इंसान
क्या जो है धनवान !
वह, जिसका बड़ा है मकान
जिसकी कड़वी है जबान!

जो जपता रहे ,भगवान-भगवान
आंखिर है कौन इंसान?
मैं, मैं कैसे हो सकता हू, इनसान
मुझे तो इसकी परिभाषा का भी नहीं है ज्ञान


कविता क्या होती है
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सच मानो ! मुझे पता नहीं,
कविता क्या होती है,

अक्सर भाव उठते है ,
जब दुनिया सोती है .
पन्ने फड़फड़ाते है,कलम चलने लगती है.
शब्द चमचमाने लगे है,
लगता है मोती है .

सच मानो ! मुझे पता नहीं,
कविता क्या होती है,

गरीब के आंसू ,किसी अबला की छटपटाहट.
रोटी जुटाने में लगे मजदूर की थकावट .
मुझे छू लेती है भीतर तक कहीं,
तब-तब आत्मा रोती है.

सच मानो ! मुझे पता नहीं,
कविता क्या होती है,
भोगो से नित ,बिगड़ता पर्यावरण
जीव जंतुओं का निकट है मरण   
व्यतिथ ह्रदय विषाद से भरा
जाने धरती हमे धोती है   
सच मानो ! मुझे पता नहीं,
कविता क्या होती है,

सपना

सपना

सपने सब देखते हैं,
कोई जब तब देखते हैं,
कोई सपने सँजोते हैं
कोई सपने मे खोते हैं!

सपने देखना बुरी बात तो नहीं,
सपने की मात , जिन्दगी की मात तो नहीं!
अच्छा नहीं सपने का रोज बदल जाना
मुश्किल हो जाता है, सपने का शकल पाना!

सपना देखो, हजार बार देखो ,
लेकिन सपना ,वही बार -बार देखो.
ऐसा सपना जिसके लिए सोना जरुरी न हो
वह बन जाये जरुरत ,जिसमे मज़बूरी न हो

क्षणिका

वही है सब को भाया,
जिसने छोड़ा,अपना-पराया

निज उन्नति की ,जिसे चाह नहीं,
पराये की प्रगति से ,जिसे डाह नहीं.
परोपकार है ,जिसकी माया
वही है सब को भाया,

जिसको दर्द का अहसास नहीं,
ख़ुशी में ,कोई अट्टहास नहीं.
जिसके लिए सम,धूप छाया
वही है सब को भाया,

क्षणिका

कांटे न होते तो मै खोया रहता!
आंधीयाँ न आयी होती तो सोया रहता.
गढ्डे न आये होते ,मै सचेत न होता!
अगर टूट जाता तो मै रेत न होता.
नहीं चाहिए फूलो का हार,
मुझे तो है काँटों से प्यार
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वो फूल ,फूल क्या ,जिसमे शूल न हो!
वो याद ,याद क्या ,जिसमे भूल न हो!
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मिटटी,खाद, पानी हो तो , पत्थर में भी बाग़ लगाया जा सकता है,
मेहनत, हौसला, धैर्य हो तो रूठे भाग को भी मनाया जा सकता है !
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सोना और लोहा

सोना भी,और लोहा भी होता है ,रेत के ढेर में!
कुछ लोग उम्र गुजार देते ,उसे ढूढने के फेर में!

सोना मिल जाए तो उसका करना होता है उसका जतन
सोने की हिफाजत के लिए ,बनाना पड़ता है एक भवन

भवन बनाने के लिये ,सोना नहीं आता है काम
रेत और सीमेंट मिल कर देते है बिल्डिंगों को अंजाम
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पड़ेगा अगर भोग विलास
तो होगा चरित्र का नाश
बंद हो जायेगा आहार ,व्यवहार
बढता चला जाएगा भ्रस्टाचार
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उनका नहीं था कोई कसूर ,
वह थे दिल के आगे मजबूर
अहं ने दिल में आग ऐसी लगाईं,
जल गयी मोहब्बत की रजाई
 
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गर्मी आते ही सूरज का बहिष्कार
लेकिन शरद ऋतु में सूरज का इन्तजार
सूरज वही ,धरती वही !
बात तो है यही!

आओ बात समझे ,जाने
क्या है इस सबका माने!
उग्र स्वभाव जैसे गर्मी का सूरज
अच्छा स्वभाव वैसे सर्दी का सूरज!
सर्दी का सूरज बन जाओ
सबके दिल में छा जाओ!
 
 
 

क्षणिका

जिंदगी की राह!
लोग मिले बेपनाह

किसी ने हमें अपनाया
किसी को हमने अपनाया
गम भी मिला ,और खशी भी मिली अथाह!

जिंदगी की राह!
लोग मिले बेपनाह

कभी हम रूठे,कभी हमने लोगो को मनाया!
कुछ ने हमें ,और कुछ को हमने निभाया
क्या होते है ये रिश्ते ,वाह!

जिंदगी की राह!
लोग मिले बेपनाह

कभी प्यार में पले!
कभी अहं में जले
कभी नफरत , कभी चाह!

जिंदगी की राह!
लोग मिले बेपनाह

नफरत



आदत बन जाती है,जब नफरत
मिट जाती हैं, जब मोहब्बत!
घेर लेता है जब शक का तूफान
जहरीला तब हो जाता है इंसान!
 
शून्य की भी अपनी है कुछ तो साख
दस को हजार ,और हजार को बना दे लाख!
 
कोई साथ दे या न दे, जिंदगी चलती रहेगी
मायूसी में भी ,उम्मीद की लों जलती रहेगी
 
अँधेरा बीत जाने के बाद ,उजाला तय है,
मेहनत करने वाले की ,सफलता तय है