Wednesday, 20 October 2021

बाढ़ की विभीषिका

आपदा की बहुत सी वीडियो फोटो सोशल नेटवर्किंग साइट पर शेयर की जा रही हैं जिनको देखकर रोंगटे खड़े हो रहे है. अधिकतर वीडियो में यह देखने को मिला है कि जहां पर भी,जो लैंडस्लाइड हुआ है या भूखंड गिरे है वहां पर अधिक जगहों पर सीमेंट से बनी हुई सरंचनाएँ ही थी ।

 भू वैज्ञानिकों की चिंताओं को नजरअंदाज करके यह सारी इमारतें खड़ी की गई, यह जानकर कि हमारे पहाड़ों की सरंचना, सीमेंट, ईंट, लोहे से बने निर्माण के लिए उपयुक्त नहीं है फिर भी इतनी निर्माण कैसे कर दिए गए।
 
 जगह -जगह रिसोर्ट और होटलों की अंतहीन श्रृंखलाएं पर्यटन के नाम पर बना दी गई है.

 एक से एक विशेषज्ञ यहां पर होने के बावजूद उनकी सेवाएं क्यों नहीं ली जा रही है, यह अबूझ प्रश्न है?
 
 क्यों पहाड़ों को उनके वृक्ष पेड़ पौधों से आच्छादित जंगलो से वँचित कर कंक्रीट के जंगल से पाटा जा रहा है.
 
 समय-समय पर यह घटनाएं हमें चेताती रहती हैं लेकिन हम लोग जागने को क्यों नहीं तैयार हैं?
 
 क्या अब हम लोगों के बीच में कोई गौरा देवी और सुंदरलाल बहुगुणा पैदा नहीं होंगे, जो पहाड़ के सरंक्षण को, अपना लक्ष्य बना सके।
 क्या हमारे संबंधित विभाग इस प्रदेश के हित को अपना लक्ष्य नहीं बना सकते हैं.
 आखिर कब तक उत्तराखंड राज्य राजनीतिक सैर सपाटे का केंद्र बना रहेगा?
 चार धाम के नाम पर या पर्यटन के नाम पर होने वाली तबाही आखिर कब तक रुक पाएगी?

क्या इन प्रश्नों के हल कभी मिलेंगे 

Friday, 15 October 2021

covid के घोटाले

कोविड काल में कई लोग घर से बाहर नहीं निकले ताकि संक्रमण के खतरे से  बच सके। लेकिन कुछ लोगों को कोविड काल अवसर लगा और ओशो सरकार ने बहुत फायदा उठाया। उत्तराखंड का RT PCR घोटाला, सरकारी अस्पतालों में यूज किये हुए ग्लव्स और मास्क बेचने का मामला आया।

 अब सुनने में आ रहा है कोविड काल में जिन भी कंपनियों ने जीवन रक्षक दवाइयों का उत्पादन किया उनके परिसरों से करोड़ों की धनराशि नगद मिल रही है। एक साधारण से 3 प्लाई मास्क को भी कई गुना दाम पर बेचा गया।
 
 शहरों गांव में छिड़काव के लिए जो बैक्टीरिया नाशक वृद्धि के लिए पैसा आया था, उससे पानी का छिड़काव कर दिया गया। कई सरकारी विभागों ने नकली बिल लगाकर भी करोड़ों का घोटाला किया हुआ है।
 सरकार ने नोटबंदी करके जो पैसा जब्त किया था उससे कई  गुना नगद पैसा इस कोविडकाल में कमाया गया।
 सरकार अगर ईमानदार लोगों को चिह्नित करके उनको इन घोटालो से पर्दा हटाने का काम सौंपे तो कई घोटाले सामने आ सकते हैं।
 आप निश्चित मानिए समाज में #समीर वानखेडे जैसे लोगों की कमी नहीं है. ऐसे ईमानदार अधिकारियों और कर्मचारियों का सरकार को लाभ उठाना चाहिए ताकि एक ईमानदार और पारदर्शी व्यवस्था स्थापित की जा सके।

Tuesday, 3 August 2021

ओलम्पिक खेल

ओलम्पिक खेलों का, खिलाड़ियों के जीवन मे बहुत बड़ा महत्व है, पर्वतारोहियों के लिए, एवरेस्ट फतह कर लेना और खिलाड़ियों का ओलम्पिक पदक, दोनों बराबर है, उस पर भी स्वर्ण, इससे बड़ी ख़ुशी  खिलाड़ियों के लिए कुछ हो नहीं सकती।
प्राचीन ओलम्पिक की शुरुआत 776 B.C में हुई मानी जाती है।
ओलंपिया पर्वत पर खेले जाने के कारण इसका नाम ओलम्पिक पड़ा। ओलम्पिक में राज्यों और शहरों के खिलाड़ी भाग लेते थे। इसकी लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि ओलम्पिक खेलों के दौरान शहरों और राज्यों के बीच लड़ाई तक स्थगित कर दिए जाते थे। इस खेलों में लड़ाई और घुड़सवारी काफी लोकप्रिय खेल थे।
कहा जाता है कि हरक्यूलिस ने ज्यूस के सम्मान में ओलम्पिक स्टेडियम बनवाया गया। छठवीं और पांचवीं शताब्दी में ओलम्पिक खेलों की लोकप्रियता चरम पर पहुंच गई थी। लेकिन बाद में रोमन साम्राज्य की बढ़ती शक्ति से यूनान खास प्रभावित हुआ और धीरे-धीरे ओलम्पिक खेलों का महत्व गिरने लगा।

आधुनिक ओलम्पिक 1896 मे शुरू हुए,ओलम्पिक खेलों मे मशाल- जलाने की शुरुआत 1928 से एम्स्टर्डम ओलम्पिक से हुई 

ओलम्पिक के इतिहास में, भारत ने पहली बार 1928 में स्वर्ण पदक मिलाकर कुल तीन पदक भी जीते ।
1900 में, एकमात्र खिलाड़ी नार्मन प्रिजार्ड (एंग्लो इंडियन) के साथ भाग लिया, जिसने एथलेटिक्स में दो रजत पदक जीते। 1920 के ग्रीष्मकालीन ओलंपिक खेलों में देश ने पहली बार एक टीम भेजी और उसके बाद से हर ग्रीष्मकालीन खेलों में भाग लिया.

जब तक हम ग्रामीण स्तर तक, खेलों को लोकप्रिय नहीं बनाएंगे, वहाँ खेलों के मैदान, विश्व के लोकप्रिय खिलाड़ियों की प्रोत्साहित करने वाली कहानियां नहीं सुनाएंगे हम ओलम्पिक मे शक्ति नहीं बन सकते.
भारत के कई प्रदेशों मे लोग जिस दुरूहता से जीवन मे संघर्ष कर रहे है, उसे देखकर तो लगता है कि अगर उनकी ऊर्जा को खेलों मे रूपांतरित कर दिया जाय तो मजा आ जाय।
खेलों को, राजनिती से जितना दूर रखा जाये, उतना ही श्रेयसकर रहेगा 

Monday, 19 July 2021

बारिश

बारिश यूँ झमझम आया न करो
तन्हा दिल को यूँ दुखाया न करो

रिमझिम की मस्ती मे डूब गया हूँ,
बिन थपकी यूँ सुलाया न करो
बारिश यूँ झमझम आया न करो
तन्हा दिल को यूँ दुखाया न करो

कदम थम गये है इस बारिश से
गरजते बादलों यूँ डराया न करो
बारिश यूँ झमझम आया न करो
तन्हा दिल को यूँ दुखाया न करो

बेशुमार बरसना भी ठीक नहीं
बस कभी चुपके से आया करो
बारिश यूँ झमझम आया न करो
तन्हा दिल को यूँ दुखाया न करो

Sunday, 11 July 2021

50साल पहले क़े उत्तराखंड क़े गावं

आइये, आपको ज्यादा नहीं 50 साल पुराने पहाड़ की सैर कराता हूँ.
बड़ा सा घर, जिसमें नीचे गोठ हुआ करता था, जिसमें गाय, भैंस, बकरिया बाँधी जाती थी. ऊपर क़े तल मे परिवार रहता था.रसोई भी अंदर ही हुआ करती है, एक लोहे की जांती (tripod )बाहर भी सगड़(अंगीठी )मे हमेशा लगी रहती थी, इस सगड़ से आग सेकने का, पानी गर्म करने का,कभी कभी हल्का फुल्का नाश्ता भी तैयार करने का काम भी किया जाता था। इस सगड़ की गर्म राख क़े अंदर रखे आलू, पीनाऊ स्याव, पकने मे, जो स्वाद देते थे, वह कल्पनातीत है।

पत्थरों की छत, लकड़ी क़े दार, बल्लीयो  क़े ढांचे पर टिकी रहती थी।
तिकोने ढलान वाली इन छतो पर, लोग कद्दू, आदि सब्जिया सुखाने क़े लिए रख दिया करते थे, यह सूखी सब्जियाँ गैर सीजन मे परिवार के लिए सुख का साग होती थी।
लोहे की चेन, जिसे शांखल कहते थे उसे दरवाजे मे ठोका जाता था और दूसरा हिस्सा चौखट क़े ऊपर लोहे 0 हुक मे अटका कर ताला लगाया जाता था, चौखट क़े ऊपर कुछ झिरियां इसलिए छोड़ी जाती थी ताकि गौरेय्या या अन्य चिड़िया उस पर, अपना घौंसला बना सके. कितना साश्चर्य था इंसान, पशु, पक्षियों क़े बीच?

सबके काम बंटे रहते थे।
क़ोई सुबह उठकर गोठ मे जानवरों की सेवा मे लग जाता था, जैसे जानवरों को घास देना, उनका गोबर इत्यादि बाहर करना, उसको भी इस तरह एक खास जगह जमा किया जाता था जो कालांतर मे खाद (मोव ) मे बदल जाता था, जिसका छिड़काव बाद मे खेतोँ मे होता था।

घंटी बंधे हुए जानवर, जब जंगल मे घास चराने क़े लिए हाँके जाते थे तो जानवरों क़े गले की घंटीयों की सामूहिक ध्वनि खूबसूरत संगीत पैदा करती थी।, इन जानवरों को जंगल मे घुमाने का काम भी बहुत जिम्मेदारी वाला होता था। फिर भी महीने मे, गाँव क़े किसी न किसी घर का पालतू जानवर, जंगली जानवरों का शिकार हो ही जाता था ।

कुछ सदस्य घर मे रहकर 15-20  सदस्यों क़े परिवार के खाने की व्यवस्था करता था घर क़े आस पास ही तरह तरह की साग सब्जी उगाई जाती थी, कुछ सदस्य खेतोँ की निराई गुड़ाई करते थे। हर घर मे 10-12लोगों का होना आम बात थी
संध्या को सब लोग एकत्रित होकर, सामूहिक वंदना, पूजा, कीर्तन करते थे, ऐसे लगता था जैसे उस दिन कुछ हांसिल कर लिया हो 

शाम को खाना खाने क़े बाद सब मिल जुल कर किस्से कहानियां शेयर किया करते थे, समाज के हालात तब कुछ भी होते थे , संयुक्त परिवार, सुख दुःख, हर समय को निभाना जानता था.
सबकुछ मानव निर्मित है, समस्याओं का मानव खुद निर्माण करता है, फिर उसमें फंसता  चला  जाता है।


Monday, 21 June 2021

जीवन की सच्चाई

शरीर मे उभरती नसे,
झुर्रियों मे सिमटती त्वचा
काश देखते हम?
सार्वभौंम है ये जो ईश्वर ने रचा

तो अहं से बच जाते शायद!

रोशनी खोती आँखें
रंग बदलते केश
छलावे से हटकर
जब देखते निर्नीमेष

तो अहं से बच जाते शायद!

इन्द्रियों मे मोहग्रस्त 
स्वाद से अतृप्त उदर
ये मृगतृष्णा का जाल
जो आया होता नजर

तो अहं से बच जाते शायद!

उतरे होते जो हम 
खोल कभी मन के द्वार,
होते ना हम कभी
संशय के शिकार

तो अहं से बच जाते शायद

"टूटती कलम से "

Wednesday, 9 June 2021

औद्योगिक घरानों का समाजिक कार्यों में योगदान

तथाकथित समाज सेवक हमारे बीच में है जो प्रिंट मिडिया या इलेक्ट्रॉनिक मिडिया के साथ आकर, समाज सेवा की महज रस्म अदायगी करते है, मिडिया न्यूज़ बनाने के, छापने का अच्छा पैसा इनसे वसूल करता है. इस तरह से समाज सेवक पैदा हो जाते है फिर यह मिडिया संस्थानों के आय स्रोत्र बन जाते है और मिडिया की बदौलत इन पर मालाएं चड़ती रहती है। जितना पैसा यह तथाकथित समाज सेवक मिडिया को देते है, उतने में 20-25 गरीबों का घर आसानी से चल सकता है।
कुछ लोग ऐसे भी है जो खुद से की गई सेवा से भी आत्म मुग्ध रहते है,इनमे अधिकतर वे लोग शुमार है जो "इसकी टोपी, उसके सर "का धंधा करते है।

जिन औद्योगिक घरानों को लोग गालियां देते है, वे चुपचाप आपदा काल में करोड़ो की मदद कर देते है, इसकी किसी को खबर नहीं लगती है.
बिड़ला ग्रुप की "Century Pulp & Paper ने प्रदेश की सभी सरकारी डेयरी को, पल्स ऑक्सीमीटर, सैनिटाइजर, मास्क, गलब्ज आदि की kit बनाकर दी
सुशीला तिवारी अस्पताल में कोविड बेड, ऑक्सीजन कंसंन्ट्रेटर मिला कर करोड़ का समान एक बार, फिर गलब्ज, मास्क का वितरण कई बार किया, हनिवेल ग्रुप ने
 ऑक्सीजन कंसंन्ट्रेटर आदि दिये
 महेंद्रा ग्रुप ने कल ही देहरादून में 100ऑक्सीजन कंसंन्ट्रेटर, एम्बुलेंस,1000liter per minute का ऑक्सीजन जेनरेशन प्लांट दिया. इसके अलावा बहुत से छोटे बड़े औद्योगिक  घराने है जिनकी सेवाएं, अतुलनीय है.
 और यह सब बिना प्रचार के चल रहा है।
 लोग कहते है इनको टेक्स में, अन्य सरकारी खर्चों में छूट मिल जाएगी, लेकिन सोशल वेलफेयर में जो योगदान इनसे देश को मिल रहा है वह निश्चित ही काबिले गौर है 🙏🏻



Saturday, 5 June 2021

उत्तराखंड मे नशे का कारोबार अरबों मे?

उत्तराखंड मे नशे का कारोबार जिस तरह से अबाध बढ़ रहा है, वह अत्यंत चिंता का विषय है।
भाँग और पोश्त उच्च हिमालयी क्षेत्रों मे उगाया जाता रहा है, लेकिन उसे कभी बतौर नशा प्रयोग नहीं किया गया।

उसको दर्द निवारक और निश्चचेतक के तौर पर सदियों से क्षेत्रीय लोगों द्वारा प्रयोग किया गया है।

पर्यटकों ने इसे नशे के तौर पर इस्तेमाल किया जाने लगा, साथ ही साथ नेपाल से जुड़े होने के कारण इस अवैध कारोबार को बढ़ावा मिला।
नेपाल मे नशे को पर्यटन का अघोषित सहयोग मिलता रहा है, जिस कारण उत्तराखंड से करोड़ो का नशा नेपाल पहुँचता है.
हाल के वर्षो मे स्थानीय युवाओ को स्मैक के नशे का शिकार होते पाया गया है, कहा जाता है कि पहले नशा बेचने वाले इन युवाओं को फ्री यह नशा तब तक दिया जाता है जब तक वे लत्त का शिकार न हो जाय।

फिर यही युवा, घर से पैसे चुराकर या जेबकतरी करके अपनी लत्त को शांत करते है. कई लोग तो नशे का कारोबार करने लगते है.

किसी भी राजनीतिक दल द्वारा इस अवैध चलते नशे के कारोबार पर क़ोई नीति या चर्चा नहीं की गई.
रोज ही क़ोई न क़ोई पकड़ा ही जाता है, लेकिन फिर भी यह बेरोक टोक चल रहा है।

क्या सरकारें असहाय है या सरकार के लोग भी इसमें भागीदार है, यह यक्ष प्रश्न उत्तराखंड के भविष्य पर गहरा असर डालेंगे।

उत्तराखंड के 2022 के विधानसभा चुनाव

आज कल सोशल मिडिया नेटवर्क के द्वारा उत्तराखंड के 2022 के चुनाव पर चर्चाये शुरू की जा रही है।
मन्त्रीमंडल के आधे सदस्य हवा का रुख भाँप कर,मंत्री बनने की शर्त पर, अपनी आत्मा की आवाज़ पर दल बदल लेते है।

20साल हो गये, वहीं चेहरे, वहीं नौकरशाह  उत्तराखंड को संभाल रहे है। पहाड़ के युवा देश के महानगरों मे, दैनिक भोगी मजदूर की तरह रहने को मजबूर है।
 ब्लाक कार्यालयों मे कई रोजगार परक योजनाएं आती है,विभाग के कर्मचारियों की स्थानीय दबँगो के साथ मिल यह योजनाएं खुर्द बुर्द कर दी जाती है. यही हाल उद्यान विभाग, वन विभाग, जड़ी बूटी विभाग का है।

शिक्षा विभाग देश के टॉप 4 राज्यों मे शामिल है तो उसका श्रेय उन अध्यापको दिया ही जाना चाहिए जो बिना किसी शिकायत के, मतदान, मतगढ़ना, जनसंख्या, मतदाता पहचान पत्र, वैक्सीनेशन जैसे अशैक्षणिक कार्यों का सम्पादन कर रहे है, कुशल और ईमानदार अध्यापकों को प्रोत्साहित करके शिक्षा को और उन्नत बनाया जा सकता है.
पर्यटन एक विभाग है, जो उत्तराखंड के लिए नई संभावनाओ के द्वार खोल सकता है, लेकिन महाराष्ट्र या तमिलनाडु मूल के अधिकारीयों से पर्यटन मे क्रांति की उमींद करना शायद ज़्यादती हो।
 हमारे पास श्री अनिल जोशी, डॉ वीर सिँह जैसे विशेषज्ञ है तो हमारी सरकारें क्यों नहीं उनकी विशेषज्ञता का लाभ लेती है.
हर विषय के ज्ञाता सम्भवतः उत्तराखंड मे होंगे, तो हम क्यों नहीं उनके विवेक से लाभॉनवित होते है. यह समझ से परे है।

चुनाव को कई लोग त्रिशंकु कह रहे है, जो कि एक सोशल नेटवर्किंग साइट्स का शिगुफा मात्र है.

हरीश रावत, आज भी कांग्रेस के दमदार नेता है, कुछ स्थानीय पदार्थो के प्रचार के लिए, उनके प्रयास काबिलेतारीफ थे, अगर पूरी कांग्रेस पार्टी हरीश रावत के इर्द गिर्द, गोलबंद होती है तो कांग्रेस राज्य मे सत्ता मे वापिसी कर सकती है।

जिस AAP के लिए सोशल मिडिया मे, या प्रिंट मिडिया मे विज्ञापन देकर जो हवा बनायीं जा रही है, उसका हश्र पंजाब विधान सभा की तरह ही होगा, जो वोट AAP को जायेंगे वह कांग्रेस की संभावनाओं को कम करेंगे, लेकिन उमींदवार के चयन पर भी बहुत कुछ निर्भर करेगा।

अभी तक BJP की उत्तराखंड सरकार का प्रदर्शन "किसी तरह शाम हो जाये यार कल फिर देखेंगे "की तर्ज पर अभी तक रहा है अगर ",अनिल बलूनी "को मुख्यमंत्री का चेहरा बनाकर चुनाव लड़ा जायेगा तो इसका BJP को लाभ मिल सकता है, नहीं तो फिर वहीं मोदी मोदी, जो कि स्थानीय राजनीति के लिए सही नहीं है।

सबसे आश्चर्य है UKD का सुशुप्तावस्था मे चले जाना, बुजुर्गो की चाय पानी की मीटिंग का अड्डा बन गयी UKD। क्यों नहीं पढ़े लिखे युवाओं को UKD आकर्षित कर पा रही है, क्यों नहीं अवकाश प्राप्त प्राध्यापको को, नौकरशाहो को UKD आमंत्रित करती है.
क्या UKD अपना राजनीतिक अवसान मान चुकी है।

Wednesday, 2 June 2021

कहानी -कोरोना अब चला गया "

बुधिया, यही नाम था ना, उस सब्जी बेचने वाले भईया का?
"तोरी ले लो, लौकी ले लो, ताजी ले लो, सब्जी ले लो"कहकर जैसे ही बुधिया अपने सब्जी का ठेला लेकर मोहल्ले से गुजरता, मोहल्ले के घरों की अधिकतर महिलाये बाहर निकल आती। मोल भाव के बहाने, बुधिया से पूरे मोहल्ले की खबर जान लेती थी।

सब कुछ ठीक ही तो चल रहा था। फिर "शुरू हुआ कोरोना का संक्रमण "। भयावह खबरों से, TV के सेट भी राक्षस से नजर आने लगे थे!
फिर पूरे देश के घरों को घरों तक सिमित कर दिया गया, दो तीन दिन के भीतर सब्जियाँ समाप्त हो गई। जयेश  ने जया से कहा "लाओ फेसमास्क दो, सब्जी का थैला दो, सुना है चौराहे मे शाक भाजी, दूध आदि सुबह 7-10बजे तक मिल रहे है, मैं भी ले आऊं।
जयेश, बुधिया के वहां होने की उमींद कर रहा था?
 लेकिन वहां देखा तो नये लोग  ठेले लगाए हुए थे। खैर सब्जी, भाजी लेकर जयेश आया ही था कि पत्नी पूछने लगी "बुधिया से ही सब्जी लेकर आये होंगे ना?"
"नहीं वह, वहाँ नहीं था", जयेश ने उत्तर दिया।
रसोई का काम निपटाकर जया कहने लगी "मिसेस गुप्ता को बता दूँ, कि बुधिया ने वहां ठेला नहीं लगाया है"।
और मिसेस गुप्ता की व्यग्रता भी जयेश समझ नहीं पाया।
आधे घंटे फोन पर बात करने के बाद, जया फोन पर आये हुए वीडिओ और मैसेज देखने लग गयी।

जयेश ने मजाक के लहजे मे कहा "ये बुधिया तो तुम लोगों का कन्हैया लग रहा है मुझे "?
"आप भी ना इस उम्र मे , एक बार सीसे मे, अपने पके बाल तो देख लेते, ऐसी मजाक करने से पहले, बस जो मुँह मे आया, आप मर्द लोग वही बोल देते हो "।
"क्या जया तुम भी मजाक सहन नहीं कर सकती हो, लेकिन मुझे भी समझ नहीं आ रहा है आँखिर बुधिया कहां गया "?जयेश ने कहा।
शाम के वक्त, जयेश चाय की चुस्कीयाँ ले रहा था, चमन लाल जी का फोन आ गया "जयेश भाई सुबह  चौराहे तक गये थे क्या?"जयेश ने कहा "हाँ "
अरे बुधिया से सब्जी लेकर आये थे क्या ?
 "नहीं "जयेश ने उत्तर दिया।
"बुधिया नहीं था क्या वहाँ?"
जयेश ने कहा  "नहीं "कल आप ही पता लगा कर आइयेगा ना "।
"नहीं अब 2हफ्ते के लिए हमारा मोहल्ला माइक्रो कन्टेनमेंट जोन डिक्लेअर हुआ है, पता नहीं आप कहां रहते है ”चमन लाल जी ने कहा
"क्या हुआ "जयेश ने पूछा
"श्रीवेश जी पॉजिटिव आये है सुना है, सुबह एम्बुलेंस लेकर गयी है उन्हें, ईश्वर करे कुछ न हो उन्हें।
 बड़ा दिल घबरा रहा है जयेश भाई, ऊपर से बुधिया की क़ोई खबर नहीं "चमन जी ने कहा और फिर फोन रख दिया।

लगभग तीन महीने की अघोषित कैद?15-20 दिन कहां गुजरे पता न लगा, तरह तरह के पकवान, लूडो सांप सीढ़ी, ताश, कुछ पुराने सीरियल, सब कुछ ही तो आजमा लिया था
TV की खबरें तो ऐसा लग रहा था कि जैसे हमारे प्राण ही न खींच ले, ऊपर से साइरन बजाती एम्बुलेंस,जयेश भी कहीं न कहीं कमजोर सा लग रहा था।

जयेश परिवार के लिए अपनी शक्ति समेटे हुए था। फिर वैक्सीन लगना चालू हुई तो कुछ मन हल्का हुआ।
खैर फिर वह दिन भी आया, जब लोकडाउन खुल गया, लोग सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए, सामान्य गतिविधियों मे लग गये, बुधिया के लिए भी, लोगों ने धारणा बना ली थी कि वह भी शायद संक्रमण का शिकार हो गया।
दिवाली के 10-15 दिनों के बाद की बात थी, आवाज़ आई "तोरी ले लो, लौकी ले लो, ताजी ले लो, सब्जी ले लो"…
सारे मोहल्ले के लोग अपना अपना काम छोड़ कर, बाहर आये और बुधिया के ठेले को घेर लिया । यूँ तो सबके चेहरे पर मास्क था,फिर भी बुधिया ने उन सबको पहचान लिया। बुधिया भी हतप्रभ था, वह सोच रहा था कि वह घर से आया है या घर आया है।
शाम को जब जयेश घर पहुंचा तो, चाय की प्याली उसे देते हुए, जया ने कहा "पता है आपको, आज बुधिया ठेला लेकर आया था "
जयेश को ऐसा लगा जैसे क़ोई कह रहा हो "कोरोना अब चला गया "।






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Tuesday, 1 June 2021

फलों वाले फूल

फूल दो तरह के होते है एक जो सौंदर्य का प्रतिनिधित्व करते है और दूसरे फलों मे परिणत हो जाते है।
फलों मे बदलने वाले फूल, ऊपर को उठे नहीं दिखेंगे।
सौंदर्य के प्रतिमान पुष्प चारों ओर, यहाँ तक कि ऊपर की ओर भी खिले रहते है।

क्या ये पुष्प भी क़ोई संदेश दे रहे है। जो फूल, फूल ही रहे है वह मानो अहंकार का प्रदर्शन कर रहे हो और जो पुष्प, फलों मे बदलते है वह झुके रहते है।

इसके वैज्ञानिक कारण भी हो सकते है, लेकिन मुझ जैसे साधारण मनुष्यों के लिए, प्रकृति से सीख लेना ज्यादा जरूरी है। हर पौधा अपने उत्पाद के अतिरिक्त एक सीख के साथ जन्म लेता है।


Saturday, 29 May 2021

Mobile V/s Newspaper

सुबह उठकर ध्यान, प्राणायाम करके बारी आती है अख़बार की।
पहले फौरी तौर पर नजरों से, पूरे अख़बार का मुआईना किया जाता है तत्पश्चताप कलम की सहायता से खास खास खबरों पर गोला इसलिए मार दिया जाता है ताकि उन खबरों का मनतव्य जाना जा सके।

यह सब करने के बाद #Sudoku को हल करने की कोशिश, हल हो गया तो well n good नहीं तो फिर उंगलियां मुड़ती है मोबाइल पर।

ठीक ईसी मुकाम पर मन के भीतर अंतर्द्वंद शुरू हो जाता है "कि सुडोकु पर फिर लगा जाय या सोशल
नेटवर्किंग साइट्स पर roasters को जवाब दिया जाय”।

मन के भीतर, भावों  की सुनामी चल रही होती है,"क्या नई पोस्ट डालू, रोस्टर को कैसे तगड़ा जवाब दूँ " यह सुनामी तब थमती है जब गौरेय्या, बुलबुल, मैंना के  मिश्रित ट्वीटस कानों मे पड़ते है.

मैंना का खास अंदाज मे सिर हिलाना, गौरेय्या का बेखौफ़  क्यारी मे भोजन की तलाश मे घूमना।
मजा आता है बिजली के तार मे बैठे बुलबुल के जोड़े को देखकर, बुलबुल के जोड़े की शरारत किसी को भी प्रभावित कर सकती है, ऐसा मेरा मानना है।

इस सबके बात मोबाइल, अख़बार पर भारी पड़ता है और  सोशल नेटवर्किंग साइट्स के जाल मे उलझने के छोड़ देता है।

Monday, 17 May 2021

दोस्त, दोस्त होते है

मेरा एक मित्र, जो बड़ा कला प्रेमी है कहने लगा "अरे यार चलो, अपने शहर के " मॉडर्न आर्ट गैलरी " मे एक ख्यातिलब्ध कलाकार क़ी पेंटिंग्स प्रदर्शन के लिए लगी हुई है, उसे देखकर आते है "

यूँ तो शिल्प का ज्ञान मुझे नहीं है, फिर भी मै दोस्त के आग्रह को टाल न सका. सोचा , दोस्त क़ी नजरों से ही सही, कुछ ज्ञान तो बड़ेगा।

वहां पहुँचे तो देखा दीवार पर देखा आड़ी, तिरछी लाइने, बिंदुओं भरी पेंटिंग्स टंगी हुई है।

उनको देखकर दोस्त कहे "वाह, मजा आ गया, यूँ ही बड़ा कलाकार नहीं है यार बंदा!।

मेरे दिमाग मे ये बातें घुस नहीं पा रही थी।  फिर मुझ पर  सवाल दाग दिया "दोस्त आया न मजा, गजब क्या पेंटिंगस बनाई है जीनियस "।

मुझे गुस्सा आया, मैंने कहा "यार ये आड़ी तिरछी लाइने देखने के लिए,इतने समय क़ी बर्बादी?

क्या कहा "आड़ी तिरछी लाइने"…?

"और नहीं तो क्या, ऐसी आड़ी तिरछी लाइने, मेरे बच्चे रोज कागज मे बनाकर, उनका हवाई जहाज बनाकर उड़ा देते है "मैंने तर्क दिया।

अरे यार, तुम्हें क्या हो गया, इतने बड़े कलाकार के जज्बात को तुम समझ नहीं पाये, "इमोशन मैन, इमोशन"। क्या मजाक करते हो यार, बच्चों के चित्र से, इतने बड़े कलाकार क़ी तुलना …

क्या हो गया, यार तुम्हें, are you alright।

मै जड़वत हो गया मै समझ नहीं पाया कि मैंने कहां गलती की।

"क्या हो गया यार तुम्हें?
सब ठीक तो है ना,
पढ़ने मे तो तुम ठीक थे यार,
कौन सा टेंशन है यार तुम्हें।

मै समझ नहीं पा रहा था "आड़ी तिरछी लाइनो " के लिए, मेरे दोस्त ने इतने सवाल क्योँ दागे होंगे? वह अलग बात है कि थोड़ा अक्ल से कमजोर भी हूँ मै।

मेरे हाथों को, अपने हाथों मे लेकर जब उसने कहा "take care यार " तब मुझे लगा यार दोस्त, दोस्त होते है, दोस्ती, दोस्ती मे ही बहुत कुछ सीखा देते है।
Love you, दोस्तो 😷

(मेरी डिजिटल कलम से )

Wednesday, 5 May 2021

बेल के खेल

जब से लगी सब्जी की बेल
देख रहा हूँ मै उसके खेल
धरती से जब ऊपर आई
चारों तरफ उसने नजर जमाई
पाया अमरुद का पेड़ निकट
बेल जाके उससे गई लिपट
दिन प्रतिदिन बड़ते उसके फेरे
कौतुहल कर रहें थे दिमाग मे मेरे
पेड़ के प्रति जगी, श्रद्धा अथाह
बेल की भी समझी,जीवन से चाह
किताबों से भी विरत, फैला ज्ञान
इसका भी हो सके तो सब करो भान

बेल के खेल देखकर, यह भाव उमड़े है।

Tuesday, 13 April 2021

Epidemic Control vs Mental strength

I am not a Medical student nor Researcher. From very beginning of this corona pendamic spread, I have personally observed so many things, which may not be correct academicially but can be debatable. My observation are as per below :-
1  Most of the victims are non vegetarians.
2  Nucleus families are more vulnerable.
3 Rough and though people are on safe zone or you may say their resistivity are admirable.
4  Those, who badly rely on packed food and junk food become easy target.
5 Followers of spirituality are least bothered.
6 Everybody knows that strong respiratory system tackles viral load effectively.

Please do meditation and make your respiratory system strong enough by pranayam.

Keep yourself busy to handle negativity.
Be Calm and cool and enjoy the life.