Saturday, 5 June 2021

उत्तराखंड के 2022 के विधानसभा चुनाव

आज कल सोशल मिडिया नेटवर्क के द्वारा उत्तराखंड के 2022 के चुनाव पर चर्चाये शुरू की जा रही है।
मन्त्रीमंडल के आधे सदस्य हवा का रुख भाँप कर,मंत्री बनने की शर्त पर, अपनी आत्मा की आवाज़ पर दल बदल लेते है।

20साल हो गये, वहीं चेहरे, वहीं नौकरशाह  उत्तराखंड को संभाल रहे है। पहाड़ के युवा देश के महानगरों मे, दैनिक भोगी मजदूर की तरह रहने को मजबूर है।
 ब्लाक कार्यालयों मे कई रोजगार परक योजनाएं आती है,विभाग के कर्मचारियों की स्थानीय दबँगो के साथ मिल यह योजनाएं खुर्द बुर्द कर दी जाती है. यही हाल उद्यान विभाग, वन विभाग, जड़ी बूटी विभाग का है।

शिक्षा विभाग देश के टॉप 4 राज्यों मे शामिल है तो उसका श्रेय उन अध्यापको दिया ही जाना चाहिए जो बिना किसी शिकायत के, मतदान, मतगढ़ना, जनसंख्या, मतदाता पहचान पत्र, वैक्सीनेशन जैसे अशैक्षणिक कार्यों का सम्पादन कर रहे है, कुशल और ईमानदार अध्यापकों को प्रोत्साहित करके शिक्षा को और उन्नत बनाया जा सकता है.
पर्यटन एक विभाग है, जो उत्तराखंड के लिए नई संभावनाओ के द्वार खोल सकता है, लेकिन महाराष्ट्र या तमिलनाडु मूल के अधिकारीयों से पर्यटन मे क्रांति की उमींद करना शायद ज़्यादती हो।
 हमारे पास श्री अनिल जोशी, डॉ वीर सिँह जैसे विशेषज्ञ है तो हमारी सरकारें क्यों नहीं उनकी विशेषज्ञता का लाभ लेती है.
हर विषय के ज्ञाता सम्भवतः उत्तराखंड मे होंगे, तो हम क्यों नहीं उनके विवेक से लाभॉनवित होते है. यह समझ से परे है।

चुनाव को कई लोग त्रिशंकु कह रहे है, जो कि एक सोशल नेटवर्किंग साइट्स का शिगुफा मात्र है.

हरीश रावत, आज भी कांग्रेस के दमदार नेता है, कुछ स्थानीय पदार्थो के प्रचार के लिए, उनके प्रयास काबिलेतारीफ थे, अगर पूरी कांग्रेस पार्टी हरीश रावत के इर्द गिर्द, गोलबंद होती है तो कांग्रेस राज्य मे सत्ता मे वापिसी कर सकती है।

जिस AAP के लिए सोशल मिडिया मे, या प्रिंट मिडिया मे विज्ञापन देकर जो हवा बनायीं जा रही है, उसका हश्र पंजाब विधान सभा की तरह ही होगा, जो वोट AAP को जायेंगे वह कांग्रेस की संभावनाओं को कम करेंगे, लेकिन उमींदवार के चयन पर भी बहुत कुछ निर्भर करेगा।

अभी तक BJP की उत्तराखंड सरकार का प्रदर्शन "किसी तरह शाम हो जाये यार कल फिर देखेंगे "की तर्ज पर अभी तक रहा है अगर ",अनिल बलूनी "को मुख्यमंत्री का चेहरा बनाकर चुनाव लड़ा जायेगा तो इसका BJP को लाभ मिल सकता है, नहीं तो फिर वहीं मोदी मोदी, जो कि स्थानीय राजनीति के लिए सही नहीं है।

सबसे आश्चर्य है UKD का सुशुप्तावस्था मे चले जाना, बुजुर्गो की चाय पानी की मीटिंग का अड्डा बन गयी UKD। क्यों नहीं पढ़े लिखे युवाओं को UKD आकर्षित कर पा रही है, क्यों नहीं अवकाश प्राप्त प्राध्यापको को, नौकरशाहो को UKD आमंत्रित करती है.
क्या UKD अपना राजनीतिक अवसान मान चुकी है।

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