जब से लगी सब्जी की बेल
देख रहा हूँ मै उसके खेल
धरती से जब ऊपर आई
चारों तरफ उसने नजर जमाई
पाया अमरुद का पेड़ निकट
बेल जाके उससे गई लिपट
दिन प्रतिदिन बड़ते उसके फेरे
कौतुहल कर रहें थे दिमाग मे मेरे
पेड़ के प्रति जगी, श्रद्धा अथाह
बेल की भी समझी,जीवन से चाह
किताबों से भी विरत, फैला ज्ञान
इसका भी हो सके तो सब करो भान
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