उत्तराखंड मे नशे का कारोबार जिस तरह से अबाध बढ़ रहा है, वह अत्यंत चिंता का विषय है।
भाँग और पोश्त उच्च हिमालयी क्षेत्रों मे उगाया जाता रहा है, लेकिन उसे कभी बतौर नशा प्रयोग नहीं किया गया।
उसको दर्द निवारक और निश्चचेतक के तौर पर सदियों से क्षेत्रीय लोगों द्वारा प्रयोग किया गया है।
पर्यटकों ने इसे नशे के तौर पर इस्तेमाल किया जाने लगा, साथ ही साथ नेपाल से जुड़े होने के कारण इस अवैध कारोबार को बढ़ावा मिला।
नेपाल मे नशे को पर्यटन का अघोषित सहयोग मिलता रहा है, जिस कारण उत्तराखंड से करोड़ो का नशा नेपाल पहुँचता है.
हाल के वर्षो मे स्थानीय युवाओ को स्मैक के नशे का शिकार होते पाया गया है, कहा जाता है कि पहले नशा बेचने वाले इन युवाओं को फ्री यह नशा तब तक दिया जाता है जब तक वे लत्त का शिकार न हो जाय।
फिर यही युवा, घर से पैसे चुराकर या जेबकतरी करके अपनी लत्त को शांत करते है. कई लोग तो नशे का कारोबार करने लगते है.
किसी भी राजनीतिक दल द्वारा इस अवैध चलते नशे के कारोबार पर क़ोई नीति या चर्चा नहीं की गई.
रोज ही क़ोई न क़ोई पकड़ा ही जाता है, लेकिन फिर भी यह बेरोक टोक चल रहा है।
क्या सरकारें असहाय है या सरकार के लोग भी इसमें भागीदार है, यह यक्ष प्रश्न उत्तराखंड के भविष्य पर गहरा असर डालेंगे।
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