Sunday, 24 July 2022

अमौलिक इंसान मौलिक जानवर

आप सब यह मानेंगे कि प्रकृति में जो भी मूल रूप जो पैदा हुआ उनमें व्यवहार में, आदत में, आचरण में, अगर किसी बदलाव आया है तो इंसान हैं, और अपने इसी अमौलिक रूप के लिए इंसान हत्याएं करता है,युद्ध करता है,अंह पालता है।
 शेर पैदा भी शेर होता है और पैदा हो जाने के बाद भी आजीवन शेर ही रहता है, मांसाहार उसकी प्रकृत्ति है।
 गाय गाय ही पैदा होती है और आजीवन गाय ही रहती है, शाकाहार उसकी प्रकृति है। शेर आपस में लड़ते हुऐ बहुत कम देखे जाते हैं, गाय या अन्य जीव-जंतु भी अपनी प्रजाति में लड़ते हुए बहुत कम देखे जाते हैं।

 जिस इंसान को हम बुद्धिमान कहते हैं, वह अपने लिए आस्था में बनाता है, रीति रिवाज बनाता है, वह अपने को रंग रूप देश धर्म के आधार पर विभाजित करता है और अपने बनाए हुए इन छोटे-छोटे समूहों के लिए, उन समूह के लिए बनायी गईं आस्थाओं के लिए, रीति रिवाज के लिए, अपने ही किसी दूसरे समूह को मिटा देना चाहता है, उससे आजीवन नफरत करता है। यहां तक कि उसने इस सृष्टि के निर्माता को अपनी समूह की परिभाषा से गढ़ दिया है और अपने गढे हुए इस सृष्टि निर्माता के लिए वह दूसरे समूह के लोगों से लड़ाई करता है।
 


 
 

Monday, 18 July 2022

Monday, 11 July 2022

धर्म और संस्कार

हमारे देश में आजकल टीवी चैनल की बहस में, संसद में विधायिका में, हिंदुओं के देवी देवताओं के बारे में अमर्यादित टिप्पणियां खूब की जा रही है। ऐसे ही टिप्पणी करने वाले लोगों को मीडिया में, सोशल नेटवर्किंग साइट्स में भी खूब तवज्जो दी जा रही है।
देश का बहुसंख्यक समाज, धर्मनिरपेक्षता की चादर ओढ़ कर सोया हुआ है और हमारे देश का एक समाज अराजकता की हद तक पार कर दे रहा है।
 धर्मनिरपेक्षता कहीं न कहीं नास्तिकता से मेल खाता हुआ सा लगता है, संविधान में धर्मनिरपेक्ष शब्द जोड़ने के बावजूद, देश की सरकारों ने मंदिरों की दानराशि पर कब्जा किया हुआ है, कितना विरोधाभास है। संविधान से धर्मनिरपेक्षता शब्द को हटाइए तभी मंदिरों की दान राशि पर हस्तक्षेप कीजिए।

 पोंगा पंडितों द्वारा तथा टीवी चैनलों पर धर्म की शिक्षा देने वाले तथाकथित संतों ने कुरीतियों  और गलत परिपार्टियों को बढ़ावा देकर सनातन संस्कृति को बहुत नुकसान पहुंचा है. सेकुलरिज्म की डुगडुगी बजाने वाले नेताओं ने भी कम नुकसान नहीं किया है.
 वेद और उपनिषद जो मनीषियों द्वारा रचे गए हैं और जो मनुष्य समाज के हर क्षेत्र में उपयोगी हैं उनका अध्ययन करने वाले लोग बहुत कम रह गए हैं, जबकि पाश्चात्य देश इन को अपना रहे हैं. इनको रचने वाले मनीषियों ने भी इनको मनुष्य मात्र के लिए समर्पित किया हुआ है।

 सनातन संस्कृति में छोटी चींटी से लेकर बड़े हाथी तक हर जीव को किसी देवी देवता का वाहन इसलिए बताया गया है ताकि मनुष्य मात्र उनकी हिंसा न करें और सारी जीवधारी साहचर्य से रह सके, इसलिए पशु बलि का सनातन संस्कृति में कोई स्थान नहीं हो सकता, कुछ पोगा पंडितों की गलत विवेचन की वजह से यह समाज में प्रचलन में आया।
 
 

Monday, 27 June 2022

तन्हाई

तन्हाई का भी अपना मजा है
कभी इसमें भी वक्त की रजा है।

हमसफ़र गर हमख्याल न हो तो,
वह भी जिंदगी की बड़ी सजा है
तन्हाई का भी अपना मजा है

रूह भी साथ छोड़ देती है दोस्तों
जब आती किसी को कजा है।
तन्हाई का भी अपना मजा है






Sunday, 12 June 2022

दावानल -कविता


वृक्ष जल उठे
जड़ी बूटी हुई खाक।
चारा चरते मवेशी मरे
भस्म हुआ उनका शाक।।
ग्रीष्म ऋतु  हैं
फैला भीषण दावानल।
वनचर  प्यासे हुए 
कब आएंगे जाने बादल।।
धुएँ से प्रदूषण हुआ
धू धू कर जल उठे जंगल।
इंसानों की गलतियों से 
हुआ 'जंगल में अमंगल'।।
 वन्यजीव हुए काल कवलित 
वन जीवन हो गया त्रस्त
मानव ना जागेगा अब भी तू तो 
धरती का सूर्य हो जायेगा अस्त।।






Wednesday, 20 October 2021

बाढ़ की विभीषिका

आपदा की बहुत सी वीडियो फोटो सोशल नेटवर्किंग साइट पर शेयर की जा रही हैं जिनको देखकर रोंगटे खड़े हो रहे है. अधिकतर वीडियो में यह देखने को मिला है कि जहां पर भी,जो लैंडस्लाइड हुआ है या भूखंड गिरे है वहां पर अधिक जगहों पर सीमेंट से बनी हुई सरंचनाएँ ही थी ।

 भू वैज्ञानिकों की चिंताओं को नजरअंदाज करके यह सारी इमारतें खड़ी की गई, यह जानकर कि हमारे पहाड़ों की सरंचना, सीमेंट, ईंट, लोहे से बने निर्माण के लिए उपयुक्त नहीं है फिर भी इतनी निर्माण कैसे कर दिए गए।
 
 जगह -जगह रिसोर्ट और होटलों की अंतहीन श्रृंखलाएं पर्यटन के नाम पर बना दी गई है.

 एक से एक विशेषज्ञ यहां पर होने के बावजूद उनकी सेवाएं क्यों नहीं ली जा रही है, यह अबूझ प्रश्न है?
 
 क्यों पहाड़ों को उनके वृक्ष पेड़ पौधों से आच्छादित जंगलो से वँचित कर कंक्रीट के जंगल से पाटा जा रहा है.
 
 समय-समय पर यह घटनाएं हमें चेताती रहती हैं लेकिन हम लोग जागने को क्यों नहीं तैयार हैं?
 
 क्या अब हम लोगों के बीच में कोई गौरा देवी और सुंदरलाल बहुगुणा पैदा नहीं होंगे, जो पहाड़ के सरंक्षण को, अपना लक्ष्य बना सके।
 क्या हमारे संबंधित विभाग इस प्रदेश के हित को अपना लक्ष्य नहीं बना सकते हैं.
 आखिर कब तक उत्तराखंड राज्य राजनीतिक सैर सपाटे का केंद्र बना रहेगा?
 चार धाम के नाम पर या पर्यटन के नाम पर होने वाली तबाही आखिर कब तक रुक पाएगी?

क्या इन प्रश्नों के हल कभी मिलेंगे 

Friday, 15 October 2021

covid के घोटाले

कोविड काल में कई लोग घर से बाहर नहीं निकले ताकि संक्रमण के खतरे से  बच सके। लेकिन कुछ लोगों को कोविड काल अवसर लगा और ओशो सरकार ने बहुत फायदा उठाया। उत्तराखंड का RT PCR घोटाला, सरकारी अस्पतालों में यूज किये हुए ग्लव्स और मास्क बेचने का मामला आया।

 अब सुनने में आ रहा है कोविड काल में जिन भी कंपनियों ने जीवन रक्षक दवाइयों का उत्पादन किया उनके परिसरों से करोड़ों की धनराशि नगद मिल रही है। एक साधारण से 3 प्लाई मास्क को भी कई गुना दाम पर बेचा गया।
 
 शहरों गांव में छिड़काव के लिए जो बैक्टीरिया नाशक वृद्धि के लिए पैसा आया था, उससे पानी का छिड़काव कर दिया गया। कई सरकारी विभागों ने नकली बिल लगाकर भी करोड़ों का घोटाला किया हुआ है।
 सरकार ने नोटबंदी करके जो पैसा जब्त किया था उससे कई  गुना नगद पैसा इस कोविडकाल में कमाया गया।
 सरकार अगर ईमानदार लोगों को चिह्नित करके उनको इन घोटालो से पर्दा हटाने का काम सौंपे तो कई घोटाले सामने आ सकते हैं।
 आप निश्चित मानिए समाज में #समीर वानखेडे जैसे लोगों की कमी नहीं है. ऐसे ईमानदार अधिकारियों और कर्मचारियों का सरकार को लाभ उठाना चाहिए ताकि एक ईमानदार और पारदर्शी व्यवस्था स्थापित की जा सके।