Sunday, 12 June 2022

दावानल -कविता


वृक्ष जल उठे
जड़ी बूटी हुई खाक।
चारा चरते मवेशी मरे
भस्म हुआ उनका शाक।।
ग्रीष्म ऋतु  हैं
फैला भीषण दावानल।
वनचर  प्यासे हुए 
कब आएंगे जाने बादल।।
धुएँ से प्रदूषण हुआ
धू धू कर जल उठे जंगल।
इंसानों की गलतियों से 
हुआ 'जंगल में अमंगल'।।
 वन्यजीव हुए काल कवलित 
वन जीवन हो गया त्रस्त
मानव ना जागेगा अब भी तू तो 
धरती का सूर्य हो जायेगा अस्त।।






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