Monday, 11 July 2022

धर्म और संस्कार

हमारे देश में आजकल टीवी चैनल की बहस में, संसद में विधायिका में, हिंदुओं के देवी देवताओं के बारे में अमर्यादित टिप्पणियां खूब की जा रही है। ऐसे ही टिप्पणी करने वाले लोगों को मीडिया में, सोशल नेटवर्किंग साइट्स में भी खूब तवज्जो दी जा रही है।
देश का बहुसंख्यक समाज, धर्मनिरपेक्षता की चादर ओढ़ कर सोया हुआ है और हमारे देश का एक समाज अराजकता की हद तक पार कर दे रहा है।
 धर्मनिरपेक्षता कहीं न कहीं नास्तिकता से मेल खाता हुआ सा लगता है, संविधान में धर्मनिरपेक्ष शब्द जोड़ने के बावजूद, देश की सरकारों ने मंदिरों की दानराशि पर कब्जा किया हुआ है, कितना विरोधाभास है। संविधान से धर्मनिरपेक्षता शब्द को हटाइए तभी मंदिरों की दान राशि पर हस्तक्षेप कीजिए।

 पोंगा पंडितों द्वारा तथा टीवी चैनलों पर धर्म की शिक्षा देने वाले तथाकथित संतों ने कुरीतियों  और गलत परिपार्टियों को बढ़ावा देकर सनातन संस्कृति को बहुत नुकसान पहुंचा है. सेकुलरिज्म की डुगडुगी बजाने वाले नेताओं ने भी कम नुकसान नहीं किया है.
 वेद और उपनिषद जो मनीषियों द्वारा रचे गए हैं और जो मनुष्य समाज के हर क्षेत्र में उपयोगी हैं उनका अध्ययन करने वाले लोग बहुत कम रह गए हैं, जबकि पाश्चात्य देश इन को अपना रहे हैं. इनको रचने वाले मनीषियों ने भी इनको मनुष्य मात्र के लिए समर्पित किया हुआ है।

 सनातन संस्कृति में छोटी चींटी से लेकर बड़े हाथी तक हर जीव को किसी देवी देवता का वाहन इसलिए बताया गया है ताकि मनुष्य मात्र उनकी हिंसा न करें और सारी जीवधारी साहचर्य से रह सके, इसलिए पशु बलि का सनातन संस्कृति में कोई स्थान नहीं हो सकता, कुछ पोगा पंडितों की गलत विवेचन की वजह से यह समाज में प्रचलन में आया।
 
 

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