Wednesday, 20 October 2021

बाढ़ की विभीषिका

आपदा की बहुत सी वीडियो फोटो सोशल नेटवर्किंग साइट पर शेयर की जा रही हैं जिनको देखकर रोंगटे खड़े हो रहे है. अधिकतर वीडियो में यह देखने को मिला है कि जहां पर भी,जो लैंडस्लाइड हुआ है या भूखंड गिरे है वहां पर अधिक जगहों पर सीमेंट से बनी हुई सरंचनाएँ ही थी ।

 भू वैज्ञानिकों की चिंताओं को नजरअंदाज करके यह सारी इमारतें खड़ी की गई, यह जानकर कि हमारे पहाड़ों की सरंचना, सीमेंट, ईंट, लोहे से बने निर्माण के लिए उपयुक्त नहीं है फिर भी इतनी निर्माण कैसे कर दिए गए।
 
 जगह -जगह रिसोर्ट और होटलों की अंतहीन श्रृंखलाएं पर्यटन के नाम पर बना दी गई है.

 एक से एक विशेषज्ञ यहां पर होने के बावजूद उनकी सेवाएं क्यों नहीं ली जा रही है, यह अबूझ प्रश्न है?
 
 क्यों पहाड़ों को उनके वृक्ष पेड़ पौधों से आच्छादित जंगलो से वँचित कर कंक्रीट के जंगल से पाटा जा रहा है.
 
 समय-समय पर यह घटनाएं हमें चेताती रहती हैं लेकिन हम लोग जागने को क्यों नहीं तैयार हैं?
 
 क्या अब हम लोगों के बीच में कोई गौरा देवी और सुंदरलाल बहुगुणा पैदा नहीं होंगे, जो पहाड़ के सरंक्षण को, अपना लक्ष्य बना सके।
 क्या हमारे संबंधित विभाग इस प्रदेश के हित को अपना लक्ष्य नहीं बना सकते हैं.
 आखिर कब तक उत्तराखंड राज्य राजनीतिक सैर सपाटे का केंद्र बना रहेगा?
 चार धाम के नाम पर या पर्यटन के नाम पर होने वाली तबाही आखिर कब तक रुक पाएगी?

क्या इन प्रश्नों के हल कभी मिलेंगे 

Friday, 15 October 2021

covid के घोटाले

कोविड काल में कई लोग घर से बाहर नहीं निकले ताकि संक्रमण के खतरे से  बच सके। लेकिन कुछ लोगों को कोविड काल अवसर लगा और ओशो सरकार ने बहुत फायदा उठाया। उत्तराखंड का RT PCR घोटाला, सरकारी अस्पतालों में यूज किये हुए ग्लव्स और मास्क बेचने का मामला आया।

 अब सुनने में आ रहा है कोविड काल में जिन भी कंपनियों ने जीवन रक्षक दवाइयों का उत्पादन किया उनके परिसरों से करोड़ों की धनराशि नगद मिल रही है। एक साधारण से 3 प्लाई मास्क को भी कई गुना दाम पर बेचा गया।
 
 शहरों गांव में छिड़काव के लिए जो बैक्टीरिया नाशक वृद्धि के लिए पैसा आया था, उससे पानी का छिड़काव कर दिया गया। कई सरकारी विभागों ने नकली बिल लगाकर भी करोड़ों का घोटाला किया हुआ है।
 सरकार ने नोटबंदी करके जो पैसा जब्त किया था उससे कई  गुना नगद पैसा इस कोविडकाल में कमाया गया।
 सरकार अगर ईमानदार लोगों को चिह्नित करके उनको इन घोटालो से पर्दा हटाने का काम सौंपे तो कई घोटाले सामने आ सकते हैं।
 आप निश्चित मानिए समाज में #समीर वानखेडे जैसे लोगों की कमी नहीं है. ऐसे ईमानदार अधिकारियों और कर्मचारियों का सरकार को लाभ उठाना चाहिए ताकि एक ईमानदार और पारदर्शी व्यवस्था स्थापित की जा सके।

Tuesday, 3 August 2021

ओलम्पिक खेल

ओलम्पिक खेलों का, खिलाड़ियों के जीवन मे बहुत बड़ा महत्व है, पर्वतारोहियों के लिए, एवरेस्ट फतह कर लेना और खिलाड़ियों का ओलम्पिक पदक, दोनों बराबर है, उस पर भी स्वर्ण, इससे बड़ी ख़ुशी  खिलाड़ियों के लिए कुछ हो नहीं सकती।
प्राचीन ओलम्पिक की शुरुआत 776 B.C में हुई मानी जाती है।
ओलंपिया पर्वत पर खेले जाने के कारण इसका नाम ओलम्पिक पड़ा। ओलम्पिक में राज्यों और शहरों के खिलाड़ी भाग लेते थे। इसकी लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि ओलम्पिक खेलों के दौरान शहरों और राज्यों के बीच लड़ाई तक स्थगित कर दिए जाते थे। इस खेलों में लड़ाई और घुड़सवारी काफी लोकप्रिय खेल थे।
कहा जाता है कि हरक्यूलिस ने ज्यूस के सम्मान में ओलम्पिक स्टेडियम बनवाया गया। छठवीं और पांचवीं शताब्दी में ओलम्पिक खेलों की लोकप्रियता चरम पर पहुंच गई थी। लेकिन बाद में रोमन साम्राज्य की बढ़ती शक्ति से यूनान खास प्रभावित हुआ और धीरे-धीरे ओलम्पिक खेलों का महत्व गिरने लगा।

आधुनिक ओलम्पिक 1896 मे शुरू हुए,ओलम्पिक खेलों मे मशाल- जलाने की शुरुआत 1928 से एम्स्टर्डम ओलम्पिक से हुई 

ओलम्पिक के इतिहास में, भारत ने पहली बार 1928 में स्वर्ण पदक मिलाकर कुल तीन पदक भी जीते ।
1900 में, एकमात्र खिलाड़ी नार्मन प्रिजार्ड (एंग्लो इंडियन) के साथ भाग लिया, जिसने एथलेटिक्स में दो रजत पदक जीते। 1920 के ग्रीष्मकालीन ओलंपिक खेलों में देश ने पहली बार एक टीम भेजी और उसके बाद से हर ग्रीष्मकालीन खेलों में भाग लिया.

जब तक हम ग्रामीण स्तर तक, खेलों को लोकप्रिय नहीं बनाएंगे, वहाँ खेलों के मैदान, विश्व के लोकप्रिय खिलाड़ियों की प्रोत्साहित करने वाली कहानियां नहीं सुनाएंगे हम ओलम्पिक मे शक्ति नहीं बन सकते.
भारत के कई प्रदेशों मे लोग जिस दुरूहता से जीवन मे संघर्ष कर रहे है, उसे देखकर तो लगता है कि अगर उनकी ऊर्जा को खेलों मे रूपांतरित कर दिया जाय तो मजा आ जाय।
खेलों को, राजनिती से जितना दूर रखा जाये, उतना ही श्रेयसकर रहेगा 

Monday, 19 July 2021

बारिश

बारिश यूँ झमझम आया न करो
तन्हा दिल को यूँ दुखाया न करो

रिमझिम की मस्ती मे डूब गया हूँ,
बिन थपकी यूँ सुलाया न करो
बारिश यूँ झमझम आया न करो
तन्हा दिल को यूँ दुखाया न करो

कदम थम गये है इस बारिश से
गरजते बादलों यूँ डराया न करो
बारिश यूँ झमझम आया न करो
तन्हा दिल को यूँ दुखाया न करो

बेशुमार बरसना भी ठीक नहीं
बस कभी चुपके से आया करो
बारिश यूँ झमझम आया न करो
तन्हा दिल को यूँ दुखाया न करो

Sunday, 11 July 2021

50साल पहले क़े उत्तराखंड क़े गावं

आइये, आपको ज्यादा नहीं 50 साल पुराने पहाड़ की सैर कराता हूँ.
बड़ा सा घर, जिसमें नीचे गोठ हुआ करता था, जिसमें गाय, भैंस, बकरिया बाँधी जाती थी. ऊपर क़े तल मे परिवार रहता था.रसोई भी अंदर ही हुआ करती है, एक लोहे की जांती (tripod )बाहर भी सगड़(अंगीठी )मे हमेशा लगी रहती थी, इस सगड़ से आग सेकने का, पानी गर्म करने का,कभी कभी हल्का फुल्का नाश्ता भी तैयार करने का काम भी किया जाता था। इस सगड़ की गर्म राख क़े अंदर रखे आलू, पीनाऊ स्याव, पकने मे, जो स्वाद देते थे, वह कल्पनातीत है।

पत्थरों की छत, लकड़ी क़े दार, बल्लीयो  क़े ढांचे पर टिकी रहती थी।
तिकोने ढलान वाली इन छतो पर, लोग कद्दू, आदि सब्जिया सुखाने क़े लिए रख दिया करते थे, यह सूखी सब्जियाँ गैर सीजन मे परिवार के लिए सुख का साग होती थी।
लोहे की चेन, जिसे शांखल कहते थे उसे दरवाजे मे ठोका जाता था और दूसरा हिस्सा चौखट क़े ऊपर लोहे 0 हुक मे अटका कर ताला लगाया जाता था, चौखट क़े ऊपर कुछ झिरियां इसलिए छोड़ी जाती थी ताकि गौरेय्या या अन्य चिड़िया उस पर, अपना घौंसला बना सके. कितना साश्चर्य था इंसान, पशु, पक्षियों क़े बीच?

सबके काम बंटे रहते थे।
क़ोई सुबह उठकर गोठ मे जानवरों की सेवा मे लग जाता था, जैसे जानवरों को घास देना, उनका गोबर इत्यादि बाहर करना, उसको भी इस तरह एक खास जगह जमा किया जाता था जो कालांतर मे खाद (मोव ) मे बदल जाता था, जिसका छिड़काव बाद मे खेतोँ मे होता था।

घंटी बंधे हुए जानवर, जब जंगल मे घास चराने क़े लिए हाँके जाते थे तो जानवरों क़े गले की घंटीयों की सामूहिक ध्वनि खूबसूरत संगीत पैदा करती थी।, इन जानवरों को जंगल मे घुमाने का काम भी बहुत जिम्मेदारी वाला होता था। फिर भी महीने मे, गाँव क़े किसी न किसी घर का पालतू जानवर, जंगली जानवरों का शिकार हो ही जाता था ।

कुछ सदस्य घर मे रहकर 15-20  सदस्यों क़े परिवार के खाने की व्यवस्था करता था घर क़े आस पास ही तरह तरह की साग सब्जी उगाई जाती थी, कुछ सदस्य खेतोँ की निराई गुड़ाई करते थे। हर घर मे 10-12लोगों का होना आम बात थी
संध्या को सब लोग एकत्रित होकर, सामूहिक वंदना, पूजा, कीर्तन करते थे, ऐसे लगता था जैसे उस दिन कुछ हांसिल कर लिया हो 

शाम को खाना खाने क़े बाद सब मिल जुल कर किस्से कहानियां शेयर किया करते थे, समाज के हालात तब कुछ भी होते थे , संयुक्त परिवार, सुख दुःख, हर समय को निभाना जानता था.
सबकुछ मानव निर्मित है, समस्याओं का मानव खुद निर्माण करता है, फिर उसमें फंसता  चला  जाता है।


Monday, 21 June 2021

जीवन की सच्चाई

शरीर मे उभरती नसे,
झुर्रियों मे सिमटती त्वचा
काश देखते हम?
सार्वभौंम है ये जो ईश्वर ने रचा

तो अहं से बच जाते शायद!

रोशनी खोती आँखें
रंग बदलते केश
छलावे से हटकर
जब देखते निर्नीमेष

तो अहं से बच जाते शायद!

इन्द्रियों मे मोहग्रस्त 
स्वाद से अतृप्त उदर
ये मृगतृष्णा का जाल
जो आया होता नजर

तो अहं से बच जाते शायद!

उतरे होते जो हम 
खोल कभी मन के द्वार,
होते ना हम कभी
संशय के शिकार

तो अहं से बच जाते शायद

"टूटती कलम से "

Wednesday, 9 June 2021

औद्योगिक घरानों का समाजिक कार्यों में योगदान

तथाकथित समाज सेवक हमारे बीच में है जो प्रिंट मिडिया या इलेक्ट्रॉनिक मिडिया के साथ आकर, समाज सेवा की महज रस्म अदायगी करते है, मिडिया न्यूज़ बनाने के, छापने का अच्छा पैसा इनसे वसूल करता है. इस तरह से समाज सेवक पैदा हो जाते है फिर यह मिडिया संस्थानों के आय स्रोत्र बन जाते है और मिडिया की बदौलत इन पर मालाएं चड़ती रहती है। जितना पैसा यह तथाकथित समाज सेवक मिडिया को देते है, उतने में 20-25 गरीबों का घर आसानी से चल सकता है।
कुछ लोग ऐसे भी है जो खुद से की गई सेवा से भी आत्म मुग्ध रहते है,इनमे अधिकतर वे लोग शुमार है जो "इसकी टोपी, उसके सर "का धंधा करते है।

जिन औद्योगिक घरानों को लोग गालियां देते है, वे चुपचाप आपदा काल में करोड़ो की मदद कर देते है, इसकी किसी को खबर नहीं लगती है.
बिड़ला ग्रुप की "Century Pulp & Paper ने प्रदेश की सभी सरकारी डेयरी को, पल्स ऑक्सीमीटर, सैनिटाइजर, मास्क, गलब्ज आदि की kit बनाकर दी
सुशीला तिवारी अस्पताल में कोविड बेड, ऑक्सीजन कंसंन्ट्रेटर मिला कर करोड़ का समान एक बार, फिर गलब्ज, मास्क का वितरण कई बार किया, हनिवेल ग्रुप ने
 ऑक्सीजन कंसंन्ट्रेटर आदि दिये
 महेंद्रा ग्रुप ने कल ही देहरादून में 100ऑक्सीजन कंसंन्ट्रेटर, एम्बुलेंस,1000liter per minute का ऑक्सीजन जेनरेशन प्लांट दिया. इसके अलावा बहुत से छोटे बड़े औद्योगिक  घराने है जिनकी सेवाएं, अतुलनीय है.
 और यह सब बिना प्रचार के चल रहा है।
 लोग कहते है इनको टेक्स में, अन्य सरकारी खर्चों में छूट मिल जाएगी, लेकिन सोशल वेलफेयर में जो योगदान इनसे देश को मिल रहा है वह निश्चित ही काबिले गौर है 🙏🏻