बुधिया, यही नाम था ना, उस सब्जी बेचने वाले भईया का?
"तोरी ले लो, लौकी ले लो, ताजी ले लो, सब्जी ले लो"कहकर जैसे ही बुधिया अपने सब्जी का ठेला लेकर मोहल्ले से गुजरता, मोहल्ले के घरों की अधिकतर महिलाये बाहर निकल आती। मोल भाव के बहाने, बुधिया से पूरे मोहल्ले की खबर जान लेती थी।
सब कुछ ठीक ही तो चल रहा था। फिर "शुरू हुआ कोरोना का संक्रमण "। भयावह खबरों से, TV के सेट भी राक्षस से नजर आने लगे थे!
फिर पूरे देश के घरों को घरों तक सिमित कर दिया गया, दो तीन दिन के भीतर सब्जियाँ समाप्त हो गई। जयेश ने जया से कहा "लाओ फेसमास्क दो, सब्जी का थैला दो, सुना है चौराहे मे शाक भाजी, दूध आदि सुबह 7-10बजे तक मिल रहे है, मैं भी ले आऊं।
जयेश, बुधिया के वहां होने की उमींद कर रहा था?
लेकिन वहां देखा तो नये लोग ठेले लगाए हुए थे। खैर सब्जी, भाजी लेकर जयेश आया ही था कि पत्नी पूछने लगी "बुधिया से ही सब्जी लेकर आये होंगे ना?"
"नहीं वह, वहाँ नहीं था", जयेश ने उत्तर दिया।
रसोई का काम निपटाकर जया कहने लगी "मिसेस गुप्ता को बता दूँ, कि बुधिया ने वहां ठेला नहीं लगाया है"।
और मिसेस गुप्ता की व्यग्रता भी जयेश समझ नहीं पाया।
आधे घंटे फोन पर बात करने के बाद, जया फोन पर आये हुए वीडिओ और मैसेज देखने लग गयी।
जयेश ने मजाक के लहजे मे कहा "ये बुधिया तो तुम लोगों का कन्हैया लग रहा है मुझे "?
"आप भी ना इस उम्र मे , एक बार सीसे मे, अपने पके बाल तो देख लेते, ऐसी मजाक करने से पहले, बस जो मुँह मे आया, आप मर्द लोग वही बोल देते हो "।
"क्या जया तुम भी मजाक सहन नहीं कर सकती हो, लेकिन मुझे भी समझ नहीं आ रहा है आँखिर बुधिया कहां गया "?जयेश ने कहा।
शाम के वक्त, जयेश चाय की चुस्कीयाँ ले रहा था, चमन लाल जी का फोन आ गया "जयेश भाई सुबह चौराहे तक गये थे क्या?"जयेश ने कहा "हाँ "
अरे बुधिया से सब्जी लेकर आये थे क्या ?
"नहीं "जयेश ने उत्तर दिया।
"बुधिया नहीं था क्या वहाँ?"
जयेश ने कहा "नहीं "कल आप ही पता लगा कर आइयेगा ना "।
"नहीं अब 2हफ्ते के लिए हमारा मोहल्ला माइक्रो कन्टेनमेंट जोन डिक्लेअर हुआ है, पता नहीं आप कहां रहते है ”चमन लाल जी ने कहा
"क्या हुआ "जयेश ने पूछा
"श्रीवेश जी पॉजिटिव आये है सुना है, सुबह एम्बुलेंस लेकर गयी है उन्हें, ईश्वर करे कुछ न हो उन्हें।
बड़ा दिल घबरा रहा है जयेश भाई, ऊपर से बुधिया की क़ोई खबर नहीं "चमन जी ने कहा और फिर फोन रख दिया।
लगभग तीन महीने की अघोषित कैद?15-20 दिन कहां गुजरे पता न लगा, तरह तरह के पकवान, लूडो सांप सीढ़ी, ताश, कुछ पुराने सीरियल, सब कुछ ही तो आजमा लिया था
TV की खबरें तो ऐसा लग रहा था कि जैसे हमारे प्राण ही न खींच ले, ऊपर से साइरन बजाती एम्बुलेंस,जयेश भी कहीं न कहीं कमजोर सा लग रहा था।
जयेश परिवार के लिए अपनी शक्ति समेटे हुए था। फिर वैक्सीन लगना चालू हुई तो कुछ मन हल्का हुआ।
खैर फिर वह दिन भी आया, जब लोकडाउन खुल गया, लोग सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए, सामान्य गतिविधियों मे लग गये, बुधिया के लिए भी, लोगों ने धारणा बना ली थी कि वह भी शायद संक्रमण का शिकार हो गया।
दिवाली के 10-15 दिनों के बाद की बात थी, आवाज़ आई "तोरी ले लो, लौकी ले लो, ताजी ले लो, सब्जी ले लो"…
सारे मोहल्ले के लोग अपना अपना काम छोड़ कर, बाहर आये और बुधिया के ठेले को घेर लिया । यूँ तो सबके चेहरे पर मास्क था,फिर भी बुधिया ने उन सबको पहचान लिया। बुधिया भी हतप्रभ था, वह सोच रहा था कि वह घर से आया है या घर आया है।
शाम को जब जयेश घर पहुंचा तो, चाय की प्याली उसे देते हुए, जया ने कहा "पता है आपको, आज बुधिया ठेला लेकर आया था "
जयेश को ऐसा लगा जैसे क़ोई कह रहा हो "कोरोना अब चला गया "।
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