Monday, 21 June 2021

जीवन की सच्चाई

शरीर मे उभरती नसे,
झुर्रियों मे सिमटती त्वचा
काश देखते हम?
सार्वभौंम है ये जो ईश्वर ने रचा

तो अहं से बच जाते शायद!

रोशनी खोती आँखें
रंग बदलते केश
छलावे से हटकर
जब देखते निर्नीमेष

तो अहं से बच जाते शायद!

इन्द्रियों मे मोहग्रस्त 
स्वाद से अतृप्त उदर
ये मृगतृष्णा का जाल
जो आया होता नजर

तो अहं से बच जाते शायद!

उतरे होते जो हम 
खोल कभी मन के द्वार,
होते ना हम कभी
संशय के शिकार

तो अहं से बच जाते शायद

"टूटती कलम से "

Wednesday, 9 June 2021

औद्योगिक घरानों का समाजिक कार्यों में योगदान

तथाकथित समाज सेवक हमारे बीच में है जो प्रिंट मिडिया या इलेक्ट्रॉनिक मिडिया के साथ आकर, समाज सेवा की महज रस्म अदायगी करते है, मिडिया न्यूज़ बनाने के, छापने का अच्छा पैसा इनसे वसूल करता है. इस तरह से समाज सेवक पैदा हो जाते है फिर यह मिडिया संस्थानों के आय स्रोत्र बन जाते है और मिडिया की बदौलत इन पर मालाएं चड़ती रहती है। जितना पैसा यह तथाकथित समाज सेवक मिडिया को देते है, उतने में 20-25 गरीबों का घर आसानी से चल सकता है।
कुछ लोग ऐसे भी है जो खुद से की गई सेवा से भी आत्म मुग्ध रहते है,इनमे अधिकतर वे लोग शुमार है जो "इसकी टोपी, उसके सर "का धंधा करते है।

जिन औद्योगिक घरानों को लोग गालियां देते है, वे चुपचाप आपदा काल में करोड़ो की मदद कर देते है, इसकी किसी को खबर नहीं लगती है.
बिड़ला ग्रुप की "Century Pulp & Paper ने प्रदेश की सभी सरकारी डेयरी को, पल्स ऑक्सीमीटर, सैनिटाइजर, मास्क, गलब्ज आदि की kit बनाकर दी
सुशीला तिवारी अस्पताल में कोविड बेड, ऑक्सीजन कंसंन्ट्रेटर मिला कर करोड़ का समान एक बार, फिर गलब्ज, मास्क का वितरण कई बार किया, हनिवेल ग्रुप ने
 ऑक्सीजन कंसंन्ट्रेटर आदि दिये
 महेंद्रा ग्रुप ने कल ही देहरादून में 100ऑक्सीजन कंसंन्ट्रेटर, एम्बुलेंस,1000liter per minute का ऑक्सीजन जेनरेशन प्लांट दिया. इसके अलावा बहुत से छोटे बड़े औद्योगिक  घराने है जिनकी सेवाएं, अतुलनीय है.
 और यह सब बिना प्रचार के चल रहा है।
 लोग कहते है इनको टेक्स में, अन्य सरकारी खर्चों में छूट मिल जाएगी, लेकिन सोशल वेलफेयर में जो योगदान इनसे देश को मिल रहा है वह निश्चित ही काबिले गौर है 🙏🏻



Saturday, 5 June 2021

उत्तराखंड मे नशे का कारोबार अरबों मे?

उत्तराखंड मे नशे का कारोबार जिस तरह से अबाध बढ़ रहा है, वह अत्यंत चिंता का विषय है।
भाँग और पोश्त उच्च हिमालयी क्षेत्रों मे उगाया जाता रहा है, लेकिन उसे कभी बतौर नशा प्रयोग नहीं किया गया।

उसको दर्द निवारक और निश्चचेतक के तौर पर सदियों से क्षेत्रीय लोगों द्वारा प्रयोग किया गया है।

पर्यटकों ने इसे नशे के तौर पर इस्तेमाल किया जाने लगा, साथ ही साथ नेपाल से जुड़े होने के कारण इस अवैध कारोबार को बढ़ावा मिला।
नेपाल मे नशे को पर्यटन का अघोषित सहयोग मिलता रहा है, जिस कारण उत्तराखंड से करोड़ो का नशा नेपाल पहुँचता है.
हाल के वर्षो मे स्थानीय युवाओ को स्मैक के नशे का शिकार होते पाया गया है, कहा जाता है कि पहले नशा बेचने वाले इन युवाओं को फ्री यह नशा तब तक दिया जाता है जब तक वे लत्त का शिकार न हो जाय।

फिर यही युवा, घर से पैसे चुराकर या जेबकतरी करके अपनी लत्त को शांत करते है. कई लोग तो नशे का कारोबार करने लगते है.

किसी भी राजनीतिक दल द्वारा इस अवैध चलते नशे के कारोबार पर क़ोई नीति या चर्चा नहीं की गई.
रोज ही क़ोई न क़ोई पकड़ा ही जाता है, लेकिन फिर भी यह बेरोक टोक चल रहा है।

क्या सरकारें असहाय है या सरकार के लोग भी इसमें भागीदार है, यह यक्ष प्रश्न उत्तराखंड के भविष्य पर गहरा असर डालेंगे।

उत्तराखंड के 2022 के विधानसभा चुनाव

आज कल सोशल मिडिया नेटवर्क के द्वारा उत्तराखंड के 2022 के चुनाव पर चर्चाये शुरू की जा रही है।
मन्त्रीमंडल के आधे सदस्य हवा का रुख भाँप कर,मंत्री बनने की शर्त पर, अपनी आत्मा की आवाज़ पर दल बदल लेते है।

20साल हो गये, वहीं चेहरे, वहीं नौकरशाह  उत्तराखंड को संभाल रहे है। पहाड़ के युवा देश के महानगरों मे, दैनिक भोगी मजदूर की तरह रहने को मजबूर है।
 ब्लाक कार्यालयों मे कई रोजगार परक योजनाएं आती है,विभाग के कर्मचारियों की स्थानीय दबँगो के साथ मिल यह योजनाएं खुर्द बुर्द कर दी जाती है. यही हाल उद्यान विभाग, वन विभाग, जड़ी बूटी विभाग का है।

शिक्षा विभाग देश के टॉप 4 राज्यों मे शामिल है तो उसका श्रेय उन अध्यापको दिया ही जाना चाहिए जो बिना किसी शिकायत के, मतदान, मतगढ़ना, जनसंख्या, मतदाता पहचान पत्र, वैक्सीनेशन जैसे अशैक्षणिक कार्यों का सम्पादन कर रहे है, कुशल और ईमानदार अध्यापकों को प्रोत्साहित करके शिक्षा को और उन्नत बनाया जा सकता है.
पर्यटन एक विभाग है, जो उत्तराखंड के लिए नई संभावनाओ के द्वार खोल सकता है, लेकिन महाराष्ट्र या तमिलनाडु मूल के अधिकारीयों से पर्यटन मे क्रांति की उमींद करना शायद ज़्यादती हो।
 हमारे पास श्री अनिल जोशी, डॉ वीर सिँह जैसे विशेषज्ञ है तो हमारी सरकारें क्यों नहीं उनकी विशेषज्ञता का लाभ लेती है.
हर विषय के ज्ञाता सम्भवतः उत्तराखंड मे होंगे, तो हम क्यों नहीं उनके विवेक से लाभॉनवित होते है. यह समझ से परे है।

चुनाव को कई लोग त्रिशंकु कह रहे है, जो कि एक सोशल नेटवर्किंग साइट्स का शिगुफा मात्र है.

हरीश रावत, आज भी कांग्रेस के दमदार नेता है, कुछ स्थानीय पदार्थो के प्रचार के लिए, उनके प्रयास काबिलेतारीफ थे, अगर पूरी कांग्रेस पार्टी हरीश रावत के इर्द गिर्द, गोलबंद होती है तो कांग्रेस राज्य मे सत्ता मे वापिसी कर सकती है।

जिस AAP के लिए सोशल मिडिया मे, या प्रिंट मिडिया मे विज्ञापन देकर जो हवा बनायीं जा रही है, उसका हश्र पंजाब विधान सभा की तरह ही होगा, जो वोट AAP को जायेंगे वह कांग्रेस की संभावनाओं को कम करेंगे, लेकिन उमींदवार के चयन पर भी बहुत कुछ निर्भर करेगा।

अभी तक BJP की उत्तराखंड सरकार का प्रदर्शन "किसी तरह शाम हो जाये यार कल फिर देखेंगे "की तर्ज पर अभी तक रहा है अगर ",अनिल बलूनी "को मुख्यमंत्री का चेहरा बनाकर चुनाव लड़ा जायेगा तो इसका BJP को लाभ मिल सकता है, नहीं तो फिर वहीं मोदी मोदी, जो कि स्थानीय राजनीति के लिए सही नहीं है।

सबसे आश्चर्य है UKD का सुशुप्तावस्था मे चले जाना, बुजुर्गो की चाय पानी की मीटिंग का अड्डा बन गयी UKD। क्यों नहीं पढ़े लिखे युवाओं को UKD आकर्षित कर पा रही है, क्यों नहीं अवकाश प्राप्त प्राध्यापको को, नौकरशाहो को UKD आमंत्रित करती है.
क्या UKD अपना राजनीतिक अवसान मान चुकी है।

Wednesday, 2 June 2021

कहानी -कोरोना अब चला गया "

बुधिया, यही नाम था ना, उस सब्जी बेचने वाले भईया का?
"तोरी ले लो, लौकी ले लो, ताजी ले लो, सब्जी ले लो"कहकर जैसे ही बुधिया अपने सब्जी का ठेला लेकर मोहल्ले से गुजरता, मोहल्ले के घरों की अधिकतर महिलाये बाहर निकल आती। मोल भाव के बहाने, बुधिया से पूरे मोहल्ले की खबर जान लेती थी।

सब कुछ ठीक ही तो चल रहा था। फिर "शुरू हुआ कोरोना का संक्रमण "। भयावह खबरों से, TV के सेट भी राक्षस से नजर आने लगे थे!
फिर पूरे देश के घरों को घरों तक सिमित कर दिया गया, दो तीन दिन के भीतर सब्जियाँ समाप्त हो गई। जयेश  ने जया से कहा "लाओ फेसमास्क दो, सब्जी का थैला दो, सुना है चौराहे मे शाक भाजी, दूध आदि सुबह 7-10बजे तक मिल रहे है, मैं भी ले आऊं।
जयेश, बुधिया के वहां होने की उमींद कर रहा था?
 लेकिन वहां देखा तो नये लोग  ठेले लगाए हुए थे। खैर सब्जी, भाजी लेकर जयेश आया ही था कि पत्नी पूछने लगी "बुधिया से ही सब्जी लेकर आये होंगे ना?"
"नहीं वह, वहाँ नहीं था", जयेश ने उत्तर दिया।
रसोई का काम निपटाकर जया कहने लगी "मिसेस गुप्ता को बता दूँ, कि बुधिया ने वहां ठेला नहीं लगाया है"।
और मिसेस गुप्ता की व्यग्रता भी जयेश समझ नहीं पाया।
आधे घंटे फोन पर बात करने के बाद, जया फोन पर आये हुए वीडिओ और मैसेज देखने लग गयी।

जयेश ने मजाक के लहजे मे कहा "ये बुधिया तो तुम लोगों का कन्हैया लग रहा है मुझे "?
"आप भी ना इस उम्र मे , एक बार सीसे मे, अपने पके बाल तो देख लेते, ऐसी मजाक करने से पहले, बस जो मुँह मे आया, आप मर्द लोग वही बोल देते हो "।
"क्या जया तुम भी मजाक सहन नहीं कर सकती हो, लेकिन मुझे भी समझ नहीं आ रहा है आँखिर बुधिया कहां गया "?जयेश ने कहा।
शाम के वक्त, जयेश चाय की चुस्कीयाँ ले रहा था, चमन लाल जी का फोन आ गया "जयेश भाई सुबह  चौराहे तक गये थे क्या?"जयेश ने कहा "हाँ "
अरे बुधिया से सब्जी लेकर आये थे क्या ?
 "नहीं "जयेश ने उत्तर दिया।
"बुधिया नहीं था क्या वहाँ?"
जयेश ने कहा  "नहीं "कल आप ही पता लगा कर आइयेगा ना "।
"नहीं अब 2हफ्ते के लिए हमारा मोहल्ला माइक्रो कन्टेनमेंट जोन डिक्लेअर हुआ है, पता नहीं आप कहां रहते है ”चमन लाल जी ने कहा
"क्या हुआ "जयेश ने पूछा
"श्रीवेश जी पॉजिटिव आये है सुना है, सुबह एम्बुलेंस लेकर गयी है उन्हें, ईश्वर करे कुछ न हो उन्हें।
 बड़ा दिल घबरा रहा है जयेश भाई, ऊपर से बुधिया की क़ोई खबर नहीं "चमन जी ने कहा और फिर फोन रख दिया।

लगभग तीन महीने की अघोषित कैद?15-20 दिन कहां गुजरे पता न लगा, तरह तरह के पकवान, लूडो सांप सीढ़ी, ताश, कुछ पुराने सीरियल, सब कुछ ही तो आजमा लिया था
TV की खबरें तो ऐसा लग रहा था कि जैसे हमारे प्राण ही न खींच ले, ऊपर से साइरन बजाती एम्बुलेंस,जयेश भी कहीं न कहीं कमजोर सा लग रहा था।

जयेश परिवार के लिए अपनी शक्ति समेटे हुए था। फिर वैक्सीन लगना चालू हुई तो कुछ मन हल्का हुआ।
खैर फिर वह दिन भी आया, जब लोकडाउन खुल गया, लोग सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए, सामान्य गतिविधियों मे लग गये, बुधिया के लिए भी, लोगों ने धारणा बना ली थी कि वह भी शायद संक्रमण का शिकार हो गया।
दिवाली के 10-15 दिनों के बाद की बात थी, आवाज़ आई "तोरी ले लो, लौकी ले लो, ताजी ले लो, सब्जी ले लो"…
सारे मोहल्ले के लोग अपना अपना काम छोड़ कर, बाहर आये और बुधिया के ठेले को घेर लिया । यूँ तो सबके चेहरे पर मास्क था,फिर भी बुधिया ने उन सबको पहचान लिया। बुधिया भी हतप्रभ था, वह सोच रहा था कि वह घर से आया है या घर आया है।
शाम को जब जयेश घर पहुंचा तो, चाय की प्याली उसे देते हुए, जया ने कहा "पता है आपको, आज बुधिया ठेला लेकर आया था "
जयेश को ऐसा लगा जैसे क़ोई कह रहा हो "कोरोना अब चला गया "।






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Tuesday, 1 June 2021

फलों वाले फूल

फूल दो तरह के होते है एक जो सौंदर्य का प्रतिनिधित्व करते है और दूसरे फलों मे परिणत हो जाते है।
फलों मे बदलने वाले फूल, ऊपर को उठे नहीं दिखेंगे।
सौंदर्य के प्रतिमान पुष्प चारों ओर, यहाँ तक कि ऊपर की ओर भी खिले रहते है।

क्या ये पुष्प भी क़ोई संदेश दे रहे है। जो फूल, फूल ही रहे है वह मानो अहंकार का प्रदर्शन कर रहे हो और जो पुष्प, फलों मे बदलते है वह झुके रहते है।

इसके वैज्ञानिक कारण भी हो सकते है, लेकिन मुझ जैसे साधारण मनुष्यों के लिए, प्रकृति से सीख लेना ज्यादा जरूरी है। हर पौधा अपने उत्पाद के अतिरिक्त एक सीख के साथ जन्म लेता है।