Thursday, 9 August 2018

Facebook-Facebook

लोगो की देखादेखी फेसबुक में अकाउंट खोला
पहला फ्रेंड रिक्वेस्ट महिला का देख दिल डोला
गायब हुई  रात की नींद व  दिन का चैन
दिल धड़क रहा था ,तड़प रहे थे नैन
रिक्वेस्ट फिर मैंने कर ली  स्वीकार
इस उहापोह में , पड़ गया बीमार
हाई, nice click से कर शुरुवात
बाद में like में जाके रुक गई बात
शायद हम दोनों ही थे facebook में नये
इसलिए  like  में जाके रुक गये

फिर धीरे धीरे बढ़ने लगे  Friend
सिखने लगा मैं भी facebook का trend
फिर पोस्ट करने लगा विचार
शुरू में like मिलते थे तीन चार
फिर शेयर किए, वीडियो  किस्से चुटीले
कुछ की पोस्ट में कमेंट किये नुकीले
बढ़ गये जरूर मेंरे लाइक
लेकिन मैं हो गया नालायक





Sunday, 26 February 2017

हाँ मैं पहाड़ी हू,

इस सुन्दर धरती का,
एक प्यारा सा देश
मेरे देश का ललाट ,
है मेरा पहाड़

इस पहाड़ पर चढ़ उतर,
लोग करते है ,अपनी  गुजर
आपाधापी की दौड़ से विरत
करते ,खुशियों का कीरत

पहाड़ है हमारी प्रेरणा ,
मौसम ,हवा ,बर्फ में ,
शांत अविचल रहने वाले ,
मेरे पहाड़

हम दूर नहीं जा पाएंगे
इनसे ज्यादा .
मुझे पता है अपने आगोश
में ,लेने को हमे ये बेकरार
करते है हमारा इन्तजार

मैं हू पहाड़ी ,हाँ पहाड़ी
यही पहचान है मेरी 

Monday, 13 February 2017

    पल
 हर दिन, यहाँ तक की आने वाला  पल भी ,
  कोई नहीं जानता नहीँ,कि वह आयेगा की नहीं !
  फिर भी यह डाह क्यों ,यह नफरत क्यों ?
  आत्मवंचना क्यों, हीनता क्यों ?
  परिचय क्यों , विषय क्यों
  दूसरे की रोटी को छीनकर  अपना,
   उदर भरने की चाहत क्यों ?
  हर पल जियो इस अहसास में,
  बस यही पल है तुम्हारा
 ,

Saturday, 24 December 2016

कवि ने तो कर दिया
धरा का आसमान से मिलन,
विज्ञान ने उसे नकार कर
कवि का दुखी कर दिया मन

हे कवि रचो कुछ और,
जहाँ न हो विज्ञान की ठौर

अब सब कल्पना से परे है
कवि पड़ो विज्ञान
अब वन विहीन जंगल में मंगल
लगेगा अज्ञान

हे कवि रचो कुछ और,
जहाँ न हो विज्ञान की ठौर

वैसे ही हो चुकी है दुनिया  बहुत जहरीली
अब जहर से डूबी स्याही की कलम चमकीली
उसे प्रलय को न धकेल दे

हे कवि रचो कुछ और,
जहाँ न हो विज्ञान की ठौर

लिखो फिर से शिशु की लोरिया
सृजन के गीत
रचो मिल बैठ फिर से ,
सुनहरा अतीत

Wednesday, 7 September 2016

भरी जवानी पैसे जोड़े ,
न कुछ  खाया
पैसे अपनाएं  ,
किया बांकी सब कुछ पराया

बँगला बनाया
गाडी आयी
नौकर आये ,
ख़ुशी-- ख़ुशी  ?

तन संवारा
घर संवारा
ऐश तो था,
पर मन -मन ?

अब है सब
पर खाना मना
चलना मना
दवा, डॉक्टर

क्या इसी दिन की चाहत में ,
जोड़ा था पैसा

Thursday, 23 May 2013


वह किसी से मिलता नहीं, जुदाई के दर से,
नहीं तो उसका क्या वास्ता,तन्हाई के घर से.

वह बिखरा है अनेको बार ,टूट के इतना.
दोस्ती तोड़ दी सबसे इसी डर से.

कभी किसी के दिल का नूर था,वह,
आज बचता –फिरता है ,उसी के नजर से

जख्म दे गए गहरा ,कुछ चेहरे इतना,
की उभर आते है ,वो दीवारों-पत्थर से.



Saturday, 18 May 2013

चिराग आएगा ही याद, जब- जब भी अँधेरा होगा, हारा वो गुमनाम,जीते हुए से सब कहेंगे ,ये कोई अपना मेरा होगा

चिराग आएगा ही याद, जब- जब भी अँधेरा होगा,
हारा वो गुमनाम,जीते हुए से सब कहेंगे ,ये कोई अपना मेरा होगा