Wednesday, 2 June 2021

कहानी -कोरोना अब चला गया "

बुधिया, यही नाम था ना, उस सब्जी बेचने वाले भईया का?
"तोरी ले लो, लौकी ले लो, ताजी ले लो, सब्जी ले लो"कहकर जैसे ही बुधिया अपने सब्जी का ठेला लेकर मोहल्ले से गुजरता, मोहल्ले के घरों की अधिकतर महिलाये बाहर निकल आती। मोल भाव के बहाने, बुधिया से पूरे मोहल्ले की खबर जान लेती थी।

सब कुछ ठीक ही तो चल रहा था। फिर "शुरू हुआ कोरोना का संक्रमण "। भयावह खबरों से, TV के सेट भी राक्षस से नजर आने लगे थे!
फिर पूरे देश के घरों को घरों तक सिमित कर दिया गया, दो तीन दिन के भीतर सब्जियाँ समाप्त हो गई। जयेश  ने जया से कहा "लाओ फेसमास्क दो, सब्जी का थैला दो, सुना है चौराहे मे शाक भाजी, दूध आदि सुबह 7-10बजे तक मिल रहे है, मैं भी ले आऊं।
जयेश, बुधिया के वहां होने की उमींद कर रहा था?
 लेकिन वहां देखा तो नये लोग  ठेले लगाए हुए थे। खैर सब्जी, भाजी लेकर जयेश आया ही था कि पत्नी पूछने लगी "बुधिया से ही सब्जी लेकर आये होंगे ना?"
"नहीं वह, वहाँ नहीं था", जयेश ने उत्तर दिया।
रसोई का काम निपटाकर जया कहने लगी "मिसेस गुप्ता को बता दूँ, कि बुधिया ने वहां ठेला नहीं लगाया है"।
और मिसेस गुप्ता की व्यग्रता भी जयेश समझ नहीं पाया।
आधे घंटे फोन पर बात करने के बाद, जया फोन पर आये हुए वीडिओ और मैसेज देखने लग गयी।

जयेश ने मजाक के लहजे मे कहा "ये बुधिया तो तुम लोगों का कन्हैया लग रहा है मुझे "?
"आप भी ना इस उम्र मे , एक बार सीसे मे, अपने पके बाल तो देख लेते, ऐसी मजाक करने से पहले, बस जो मुँह मे आया, आप मर्द लोग वही बोल देते हो "।
"क्या जया तुम भी मजाक सहन नहीं कर सकती हो, लेकिन मुझे भी समझ नहीं आ रहा है आँखिर बुधिया कहां गया "?जयेश ने कहा।
शाम के वक्त, जयेश चाय की चुस्कीयाँ ले रहा था, चमन लाल जी का फोन आ गया "जयेश भाई सुबह  चौराहे तक गये थे क्या?"जयेश ने कहा "हाँ "
अरे बुधिया से सब्जी लेकर आये थे क्या ?
 "नहीं "जयेश ने उत्तर दिया।
"बुधिया नहीं था क्या वहाँ?"
जयेश ने कहा  "नहीं "कल आप ही पता लगा कर आइयेगा ना "।
"नहीं अब 2हफ्ते के लिए हमारा मोहल्ला माइक्रो कन्टेनमेंट जोन डिक्लेअर हुआ है, पता नहीं आप कहां रहते है ”चमन लाल जी ने कहा
"क्या हुआ "जयेश ने पूछा
"श्रीवेश जी पॉजिटिव आये है सुना है, सुबह एम्बुलेंस लेकर गयी है उन्हें, ईश्वर करे कुछ न हो उन्हें।
 बड़ा दिल घबरा रहा है जयेश भाई, ऊपर से बुधिया की क़ोई खबर नहीं "चमन जी ने कहा और फिर फोन रख दिया।

लगभग तीन महीने की अघोषित कैद?15-20 दिन कहां गुजरे पता न लगा, तरह तरह के पकवान, लूडो सांप सीढ़ी, ताश, कुछ पुराने सीरियल, सब कुछ ही तो आजमा लिया था
TV की खबरें तो ऐसा लग रहा था कि जैसे हमारे प्राण ही न खींच ले, ऊपर से साइरन बजाती एम्बुलेंस,जयेश भी कहीं न कहीं कमजोर सा लग रहा था।

जयेश परिवार के लिए अपनी शक्ति समेटे हुए था। फिर वैक्सीन लगना चालू हुई तो कुछ मन हल्का हुआ।
खैर फिर वह दिन भी आया, जब लोकडाउन खुल गया, लोग सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए, सामान्य गतिविधियों मे लग गये, बुधिया के लिए भी, लोगों ने धारणा बना ली थी कि वह भी शायद संक्रमण का शिकार हो गया।
दिवाली के 10-15 दिनों के बाद की बात थी, आवाज़ आई "तोरी ले लो, लौकी ले लो, ताजी ले लो, सब्जी ले लो"…
सारे मोहल्ले के लोग अपना अपना काम छोड़ कर, बाहर आये और बुधिया के ठेले को घेर लिया । यूँ तो सबके चेहरे पर मास्क था,फिर भी बुधिया ने उन सबको पहचान लिया। बुधिया भी हतप्रभ था, वह सोच रहा था कि वह घर से आया है या घर आया है।
शाम को जब जयेश घर पहुंचा तो, चाय की प्याली उसे देते हुए, जया ने कहा "पता है आपको, आज बुधिया ठेला लेकर आया था "
जयेश को ऐसा लगा जैसे क़ोई कह रहा हो "कोरोना अब चला गया "।






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Tuesday, 1 June 2021

फलों वाले फूल

फूल दो तरह के होते है एक जो सौंदर्य का प्रतिनिधित्व करते है और दूसरे फलों मे परिणत हो जाते है।
फलों मे बदलने वाले फूल, ऊपर को उठे नहीं दिखेंगे।
सौंदर्य के प्रतिमान पुष्प चारों ओर, यहाँ तक कि ऊपर की ओर भी खिले रहते है।

क्या ये पुष्प भी क़ोई संदेश दे रहे है। जो फूल, फूल ही रहे है वह मानो अहंकार का प्रदर्शन कर रहे हो और जो पुष्प, फलों मे बदलते है वह झुके रहते है।

इसके वैज्ञानिक कारण भी हो सकते है, लेकिन मुझ जैसे साधारण मनुष्यों के लिए, प्रकृति से सीख लेना ज्यादा जरूरी है। हर पौधा अपने उत्पाद के अतिरिक्त एक सीख के साथ जन्म लेता है।


Saturday, 29 May 2021

Mobile V/s Newspaper

सुबह उठकर ध्यान, प्राणायाम करके बारी आती है अख़बार की।
पहले फौरी तौर पर नजरों से, पूरे अख़बार का मुआईना किया जाता है तत्पश्चताप कलम की सहायता से खास खास खबरों पर गोला इसलिए मार दिया जाता है ताकि उन खबरों का मनतव्य जाना जा सके।

यह सब करने के बाद #Sudoku को हल करने की कोशिश, हल हो गया तो well n good नहीं तो फिर उंगलियां मुड़ती है मोबाइल पर।

ठीक ईसी मुकाम पर मन के भीतर अंतर्द्वंद शुरू हो जाता है "कि सुडोकु पर फिर लगा जाय या सोशल
नेटवर्किंग साइट्स पर roasters को जवाब दिया जाय”।

मन के भीतर, भावों  की सुनामी चल रही होती है,"क्या नई पोस्ट डालू, रोस्टर को कैसे तगड़ा जवाब दूँ " यह सुनामी तब थमती है जब गौरेय्या, बुलबुल, मैंना के  मिश्रित ट्वीटस कानों मे पड़ते है.

मैंना का खास अंदाज मे सिर हिलाना, गौरेय्या का बेखौफ़  क्यारी मे भोजन की तलाश मे घूमना।
मजा आता है बिजली के तार मे बैठे बुलबुल के जोड़े को देखकर, बुलबुल के जोड़े की शरारत किसी को भी प्रभावित कर सकती है, ऐसा मेरा मानना है।

इस सबके बात मोबाइल, अख़बार पर भारी पड़ता है और  सोशल नेटवर्किंग साइट्स के जाल मे उलझने के छोड़ देता है।

Monday, 17 May 2021

दोस्त, दोस्त होते है

मेरा एक मित्र, जो बड़ा कला प्रेमी है कहने लगा "अरे यार चलो, अपने शहर के " मॉडर्न आर्ट गैलरी " मे एक ख्यातिलब्ध कलाकार क़ी पेंटिंग्स प्रदर्शन के लिए लगी हुई है, उसे देखकर आते है "

यूँ तो शिल्प का ज्ञान मुझे नहीं है, फिर भी मै दोस्त के आग्रह को टाल न सका. सोचा , दोस्त क़ी नजरों से ही सही, कुछ ज्ञान तो बड़ेगा।

वहां पहुँचे तो देखा दीवार पर देखा आड़ी, तिरछी लाइने, बिंदुओं भरी पेंटिंग्स टंगी हुई है।

उनको देखकर दोस्त कहे "वाह, मजा आ गया, यूँ ही बड़ा कलाकार नहीं है यार बंदा!।

मेरे दिमाग मे ये बातें घुस नहीं पा रही थी।  फिर मुझ पर  सवाल दाग दिया "दोस्त आया न मजा, गजब क्या पेंटिंगस बनाई है जीनियस "।

मुझे गुस्सा आया, मैंने कहा "यार ये आड़ी तिरछी लाइने देखने के लिए,इतने समय क़ी बर्बादी?

क्या कहा "आड़ी तिरछी लाइने"…?

"और नहीं तो क्या, ऐसी आड़ी तिरछी लाइने, मेरे बच्चे रोज कागज मे बनाकर, उनका हवाई जहाज बनाकर उड़ा देते है "मैंने तर्क दिया।

अरे यार, तुम्हें क्या हो गया, इतने बड़े कलाकार के जज्बात को तुम समझ नहीं पाये, "इमोशन मैन, इमोशन"। क्या मजाक करते हो यार, बच्चों के चित्र से, इतने बड़े कलाकार क़ी तुलना …

क्या हो गया, यार तुम्हें, are you alright।

मै जड़वत हो गया मै समझ नहीं पाया कि मैंने कहां गलती की।

"क्या हो गया यार तुम्हें?
सब ठीक तो है ना,
पढ़ने मे तो तुम ठीक थे यार,
कौन सा टेंशन है यार तुम्हें।

मै समझ नहीं पा रहा था "आड़ी तिरछी लाइनो " के लिए, मेरे दोस्त ने इतने सवाल क्योँ दागे होंगे? वह अलग बात है कि थोड़ा अक्ल से कमजोर भी हूँ मै।

मेरे हाथों को, अपने हाथों मे लेकर जब उसने कहा "take care यार " तब मुझे लगा यार दोस्त, दोस्त होते है, दोस्ती, दोस्ती मे ही बहुत कुछ सीखा देते है।
Love you, दोस्तो 😷

(मेरी डिजिटल कलम से )

Wednesday, 5 May 2021

बेल के खेल

जब से लगी सब्जी की बेल
देख रहा हूँ मै उसके खेल
धरती से जब ऊपर आई
चारों तरफ उसने नजर जमाई
पाया अमरुद का पेड़ निकट
बेल जाके उससे गई लिपट
दिन प्रतिदिन बड़ते उसके फेरे
कौतुहल कर रहें थे दिमाग मे मेरे
पेड़ के प्रति जगी, श्रद्धा अथाह
बेल की भी समझी,जीवन से चाह
किताबों से भी विरत, फैला ज्ञान
इसका भी हो सके तो सब करो भान

बेल के खेल देखकर, यह भाव उमड़े है।

Tuesday, 13 April 2021

Epidemic Control vs Mental strength

I am not a Medical student nor Researcher. From very beginning of this corona pendamic spread, I have personally observed so many things, which may not be correct academicially but can be debatable. My observation are as per below :-
1  Most of the victims are non vegetarians.
2  Nucleus families are more vulnerable.
3 Rough and though people are on safe zone or you may say their resistivity are admirable.
4  Those, who badly rely on packed food and junk food become easy target.
5 Followers of spirituality are least bothered.
6 Everybody knows that strong respiratory system tackles viral load effectively.

Please do meditation and make your respiratory system strong enough by pranayam.

Keep yourself busy to handle negativity.
Be Calm and cool and enjoy the life.

Saturday, 7 November 2020

Winter in North India

We are feeling just chill because winter started. Birds had stopped chirping early in the evening due to decreasing temperature of environment.. covid-19 is still proving Lethal for the humanity. Haziness is appearing in the sky so so why mood  is upset and gloomy. 
 Don't you think we humans are losing or immunity and hot pool creatures are increasing day by day. We always talk about good beginning,  a new beginning, a new day. 
 We have no option but to believe in this thing. 
 The poet inside the heart is feeling imprisoned.