सुबह उठकर ध्यान, प्राणायाम करके बारी आती है अख़बार की।
पहले फौरी तौर पर नजरों से, पूरे अख़बार का मुआईना किया जाता है तत्पश्चताप कलम की सहायता से खास खास खबरों पर गोला इसलिए मार दिया जाता है ताकि उन खबरों का मनतव्य जाना जा सके।
यह सब करने के बाद #Sudoku को हल करने की कोशिश, हल हो गया तो well n good नहीं तो फिर उंगलियां मुड़ती है मोबाइल पर।
ठीक ईसी मुकाम पर मन के भीतर अंतर्द्वंद शुरू हो जाता है "कि सुडोकु पर फिर लगा जाय या सोशल
नेटवर्किंग साइट्स पर roasters को जवाब दिया जाय”।
मन के भीतर, भावों की सुनामी चल रही होती है,"क्या नई पोस्ट डालू, रोस्टर को कैसे तगड़ा जवाब दूँ " यह सुनामी तब थमती है जब गौरेय्या, बुलबुल, मैंना के मिश्रित ट्वीटस कानों मे पड़ते है.
मैंना का खास अंदाज मे सिर हिलाना, गौरेय्या का बेखौफ़ क्यारी मे भोजन की तलाश मे घूमना।
मजा आता है बिजली के तार मे बैठे बुलबुल के जोड़े को देखकर, बुलबुल के जोड़े की शरारत किसी को भी प्रभावित कर सकती है, ऐसा मेरा मानना है।
इस सबके बात मोबाइल, अख़बार पर भारी पड़ता है और सोशल नेटवर्किंग साइट्स के जाल मे उलझने के छोड़ देता है।