Sunday, 24 July 2022

वे भी थे किसी क़े बच्चे
पर उनके पास खिलौने नहीं थे!
वे भटक रहे थे गली गली,
लटकाये कंधे मे बड़ा सा थैला?
दूध दही की थैलियां
पानी, जूस की बोतले
देखकर, चमकती उनकी आँखें,
उनके बिखरे बाल
बदन लगता निढाल
इसी दुनियाँ क़े है ये बच्चे
जहाँ किसी का बच्चा, चैन से
मखमल क़े गद्दे मे सोता है
फिर ऐसा होता क्यों है?
सुखी बच्चा फिर भी रोता क्यों है?
बड़ा सा थैला लटकाये बच्चे
लगता है, जैसे ढो रहे हों,
अपनी, ख़ुशी अपना दर्द भी
उस बड़े से थैले मे.

अमौलिक इंसान मौलिक जानवर

आप सब यह मानेंगे कि प्रकृति में जो भी मूल रूप जो पैदा हुआ उनमें व्यवहार में, आदत में, आचरण में, अगर किसी बदलाव आया है तो इंसान हैं, और अपने इसी अमौलिक रूप के लिए इंसान हत्याएं करता है,युद्ध करता है,अंह पालता है।
 शेर पैदा भी शेर होता है और पैदा हो जाने के बाद भी आजीवन शेर ही रहता है, मांसाहार उसकी प्रकृत्ति है।
 गाय गाय ही पैदा होती है और आजीवन गाय ही रहती है, शाकाहार उसकी प्रकृति है। शेर आपस में लड़ते हुऐ बहुत कम देखे जाते हैं, गाय या अन्य जीव-जंतु भी अपनी प्रजाति में लड़ते हुए बहुत कम देखे जाते हैं।

 जिस इंसान को हम बुद्धिमान कहते हैं, वह अपने लिए आस्था में बनाता है, रीति रिवाज बनाता है, वह अपने को रंग रूप देश धर्म के आधार पर विभाजित करता है और अपने बनाए हुए इन छोटे-छोटे समूहों के लिए, उन समूह के लिए बनायी गईं आस्थाओं के लिए, रीति रिवाज के लिए, अपने ही किसी दूसरे समूह को मिटा देना चाहता है, उससे आजीवन नफरत करता है। यहां तक कि उसने इस सृष्टि के निर्माता को अपनी समूह की परिभाषा से गढ़ दिया है और अपने गढे हुए इस सृष्टि निर्माता के लिए वह दूसरे समूह के लोगों से लड़ाई करता है।
 


 
 

Monday, 11 July 2022

धर्म और संस्कार

हमारे देश में आजकल टीवी चैनल की बहस में, संसद में विधायिका में, हिंदुओं के देवी देवताओं के बारे में अमर्यादित टिप्पणियां खूब की जा रही है। ऐसे ही टिप्पणी करने वाले लोगों को मीडिया में, सोशल नेटवर्किंग साइट्स में भी खूब तवज्जो दी जा रही है।
देश का बहुसंख्यक समाज, धर्मनिरपेक्षता की चादर ओढ़ कर सोया हुआ है और हमारे देश का एक समाज अराजकता की हद तक पार कर दे रहा है।
 धर्मनिरपेक्षता कहीं न कहीं नास्तिकता से मेल खाता हुआ सा लगता है, संविधान में धर्मनिरपेक्ष शब्द जोड़ने के बावजूद, देश की सरकारों ने मंदिरों की दानराशि पर कब्जा किया हुआ है, कितना विरोधाभास है। संविधान से धर्मनिरपेक्षता शब्द को हटाइए तभी मंदिरों की दान राशि पर हस्तक्षेप कीजिए।

 पोंगा पंडितों द्वारा तथा टीवी चैनलों पर धर्म की शिक्षा देने वाले तथाकथित संतों ने कुरीतियों  और गलत परिपार्टियों को बढ़ावा देकर सनातन संस्कृति को बहुत नुकसान पहुंचा है. सेकुलरिज्म की डुगडुगी बजाने वाले नेताओं ने भी कम नुकसान नहीं किया है.
 वेद और उपनिषद जो मनीषियों द्वारा रचे गए हैं और जो मनुष्य समाज के हर क्षेत्र में उपयोगी हैं उनका अध्ययन करने वाले लोग बहुत कम रह गए हैं, जबकि पाश्चात्य देश इन को अपना रहे हैं. इनको रचने वाले मनीषियों ने भी इनको मनुष्य मात्र के लिए समर्पित किया हुआ है।

 सनातन संस्कृति में छोटी चींटी से लेकर बड़े हाथी तक हर जीव को किसी देवी देवता का वाहन इसलिए बताया गया है ताकि मनुष्य मात्र उनकी हिंसा न करें और सारी जीवधारी साहचर्य से रह सके, इसलिए पशु बलि का सनातन संस्कृति में कोई स्थान नहीं हो सकता, कुछ पोगा पंडितों की गलत विवेचन की वजह से यह समाज में प्रचलन में आया।