Monday, 19 July 2021

बारिश

बारिश यूँ झमझम आया न करो
तन्हा दिल को यूँ दुखाया न करो

रिमझिम की मस्ती मे डूब गया हूँ,
बिन थपकी यूँ सुलाया न करो
बारिश यूँ झमझम आया न करो
तन्हा दिल को यूँ दुखाया न करो

कदम थम गये है इस बारिश से
गरजते बादलों यूँ डराया न करो
बारिश यूँ झमझम आया न करो
तन्हा दिल को यूँ दुखाया न करो

बेशुमार बरसना भी ठीक नहीं
बस कभी चुपके से आया करो
बारिश यूँ झमझम आया न करो
तन्हा दिल को यूँ दुखाया न करो

Sunday, 11 July 2021

50साल पहले क़े उत्तराखंड क़े गावं

आइये, आपको ज्यादा नहीं 50 साल पुराने पहाड़ की सैर कराता हूँ.
बड़ा सा घर, जिसमें नीचे गोठ हुआ करता था, जिसमें गाय, भैंस, बकरिया बाँधी जाती थी. ऊपर क़े तल मे परिवार रहता था.रसोई भी अंदर ही हुआ करती है, एक लोहे की जांती (tripod )बाहर भी सगड़(अंगीठी )मे हमेशा लगी रहती थी, इस सगड़ से आग सेकने का, पानी गर्म करने का,कभी कभी हल्का फुल्का नाश्ता भी तैयार करने का काम भी किया जाता था। इस सगड़ की गर्म राख क़े अंदर रखे आलू, पीनाऊ स्याव, पकने मे, जो स्वाद देते थे, वह कल्पनातीत है।

पत्थरों की छत, लकड़ी क़े दार, बल्लीयो  क़े ढांचे पर टिकी रहती थी।
तिकोने ढलान वाली इन छतो पर, लोग कद्दू, आदि सब्जिया सुखाने क़े लिए रख दिया करते थे, यह सूखी सब्जियाँ गैर सीजन मे परिवार के लिए सुख का साग होती थी।
लोहे की चेन, जिसे शांखल कहते थे उसे दरवाजे मे ठोका जाता था और दूसरा हिस्सा चौखट क़े ऊपर लोहे 0 हुक मे अटका कर ताला लगाया जाता था, चौखट क़े ऊपर कुछ झिरियां इसलिए छोड़ी जाती थी ताकि गौरेय्या या अन्य चिड़िया उस पर, अपना घौंसला बना सके. कितना साश्चर्य था इंसान, पशु, पक्षियों क़े बीच?

सबके काम बंटे रहते थे।
क़ोई सुबह उठकर गोठ मे जानवरों की सेवा मे लग जाता था, जैसे जानवरों को घास देना, उनका गोबर इत्यादि बाहर करना, उसको भी इस तरह एक खास जगह जमा किया जाता था जो कालांतर मे खाद (मोव ) मे बदल जाता था, जिसका छिड़काव बाद मे खेतोँ मे होता था।

घंटी बंधे हुए जानवर, जब जंगल मे घास चराने क़े लिए हाँके जाते थे तो जानवरों क़े गले की घंटीयों की सामूहिक ध्वनि खूबसूरत संगीत पैदा करती थी।, इन जानवरों को जंगल मे घुमाने का काम भी बहुत जिम्मेदारी वाला होता था। फिर भी महीने मे, गाँव क़े किसी न किसी घर का पालतू जानवर, जंगली जानवरों का शिकार हो ही जाता था ।

कुछ सदस्य घर मे रहकर 15-20  सदस्यों क़े परिवार के खाने की व्यवस्था करता था घर क़े आस पास ही तरह तरह की साग सब्जी उगाई जाती थी, कुछ सदस्य खेतोँ की निराई गुड़ाई करते थे। हर घर मे 10-12लोगों का होना आम बात थी
संध्या को सब लोग एकत्रित होकर, सामूहिक वंदना, पूजा, कीर्तन करते थे, ऐसे लगता था जैसे उस दिन कुछ हांसिल कर लिया हो 

शाम को खाना खाने क़े बाद सब मिल जुल कर किस्से कहानियां शेयर किया करते थे, समाज के हालात तब कुछ भी होते थे , संयुक्त परिवार, सुख दुःख, हर समय को निभाना जानता था.
सबकुछ मानव निर्मित है, समस्याओं का मानव खुद निर्माण करता है, फिर उसमें फंसता  चला  जाता है।