Saturday, 24 December 2016

कवि ने तो कर दिया
धरा का आसमान से मिलन,
विज्ञान ने उसे नकार कर
कवि का दुखी कर दिया मन

हे कवि रचो कुछ और,
जहाँ न हो विज्ञान की ठौर

अब सब कल्पना से परे है
कवि पड़ो विज्ञान
अब वन विहीन जंगल में मंगल
लगेगा अज्ञान

हे कवि रचो कुछ और,
जहाँ न हो विज्ञान की ठौर

वैसे ही हो चुकी है दुनिया  बहुत जहरीली
अब जहर से डूबी स्याही की कलम चमकीली
उसे प्रलय को न धकेल दे

हे कवि रचो कुछ और,
जहाँ न हो विज्ञान की ठौर

लिखो फिर से शिशु की लोरिया
सृजन के गीत
रचो मिल बैठ फिर से ,
सुनहरा अतीत